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स्पेन और ग्रीस भी सोशल मीडिया के खिलाफ

यूरोप में डिजिटल कर्फ्यू का दौर और व्यापक हुआ

मैड्रिड/एथेंस: युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में यूरोपीय संघ के दो प्रमुख देशों, स्पेन और ग्रीस ने एक ऐतिहासिक पहल की है। दोनों देशों ने संयुक्त रूप से एक डिजिटल सुरक्षा कानून प्रस्तावित किया है, जिसे आम बोलचाल में डिजिटल कर्फ्यू कहा जा रहा है। इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के हानिकारक प्रभावों से पूरी तरह दूर रखना है।

प्रस्तावित कानून के अनुसार, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, स्नैपचैट और एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म अब 16 साल से कम उम्र के किशोरों के लिए प्रतिबंधित होंगे। यह केवल एक सुझाव नहीं बल्कि एक कड़ा कानूनी प्रावधान है। कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसका एज वेरिफिकेशन (आयु सत्यापन) तंत्र है। अब कंपनियों को केवल एक साधारण क्या आप 18 वर्ष के हैं? वाले बॉक्स से काम नहीं चलेगा; उन्हें सरकारी डेटाबेस या बायोमेट्रिक पहचान के जरिए उपयोगकर्ता की सटीक उम्र सुनिश्चित करनी होगी।

इस घोषणा ने सिलिकॉन वैली की बड़ी कंपनियों में हड़कंप मचा दिया है। कानून के उल्लंघन की स्थिति में सजा का प्रावधान अत्यंत कठोर रखा गया है। नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों पर उनके कुल वैश्विक टर्नओवर का 5 प्रतिशत तक जुर्माना लगाया जा सकता है। यह राशि अरबों डॉलर में हो सकती है। सरकारों को यह अधिकार होगा कि वे कंपनियों के एल्गोरिदम की जांच कर सकें कि वे बच्चों को लक्षित तो नहीं कर रहे हैं।

स्पेन के शिक्षा मंत्री ने इस कदम का बचाव करते हुए एक प्रेस वार्ता में कहा, स्मार्टफोन की लत और सोशल मीडिया पर मिलने वाला डोपामाइन हमारे युवाओं की एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर रहा है। हम अपनी आने वाली पीढ़ी को एक डिजिटल भूलभुलैया में खोने नहीं दे सकते। शिक्षकों और मनोवैज्ञानिकों के समूहों ने इस पहल को साहसिक और आवश्यक बताया है। उनका तर्क है कि साइबर बुलिंग, बॉडी डिस्मोर्फिया (अपने शरीर को लेकर हीन भावना) और नींद की कमी जैसे मुद्दे इसी डिजिटल लत की देन हैं।

दूसरी ओर, टेक जगत और कुछ मानवाधिकार संगठनों ने इसे डिजिटल स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का उल्लंघन करार दिया है। उनका तर्क है कि प्रतिबंध लगाने के बजाय डिजिटल साक्षरता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हालांकि, विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह कानून पूरे यूरोपीय संघ के लिए एक रोल मॉडल बन सकता है। यदि स्पेन और ग्रीस इसमें सफल होते हैं, तो फ्रांस और जर्मनी जैसे देश भी इसी राह पर चल सकते हैं।

आने वाले महीनों में इस कानून पर यूरोपीय संसद में बहस होने की संभावना है। यदि यह पारित हो जाता है, तो यह वैश्विक स्तर पर इंटरनेट के उपयोग के तरीके को हमेशा के लिए बदल सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि सोशल मीडिया कंपनियां इस अभूतपूर्व कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए क्या रणनीति अपनाती हैं।