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बजट 2026, असर समझने में अभी वक्त लगेगा

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया उनका नौवां बजट किसी नाटकीय घोषणा या बिग बैंग सुधारों के बजाय सर्जिकल स्टेप्स (सटीक हस्तक्षेप) और राजकोषीय विवेक का मिश्रण नजर आता है। ऐसे समय में जब बाजार के सटोरिये और आर्थिक विश्लेषक 1991 जैसे किसी क्रांतिकारी क्षण की उम्मीद कर रहे थे, सरकार ने एक सुरक्षित और सधी हुई राह चुनना बेहतर समझा।

यह बजट शोर-शराबे और उम्मीद के बीच संतुलन बनाने की एक गंभीर कोशिश है, जिसमें व्यापक बदलावों के बजाय सूक्ष्म आर्थिक तंत्र को दुरुस्त करने पर अधिक ध्यान दिया गया है। बजट 2026 की सबसे बड़ी ताकत इसका राजकोषीय विवेक है। सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 4.3 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य रखा है, जो पिछले वर्ष के 4.4 प्रतिशत से कम है।

यह अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों को एक स्पष्ट संकेत है कि भारत अपनी आर्थिक स्थिरता से समझौता नहीं करेगा। हालांकि, यह अनुशासन एक भारी कीमत के साथ आता है; सरकार को हर दिन लगभग 3,800 करोड़ रुपये केवल ब्याज भुगतान पर खर्च करने होंगे। पूंजीगत व्यय को 11.2 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर₹12.2 लाख करोड़ रुपये करना यह दर्शाता है कि निजी निवेश में सुस्ती के बावजूद सरकार भौतिक बुनियादी ढांचे की गति को कम नहीं होने देना चाहती।

सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर और सिटी क्लस्टर्स के लिए 5,000 करोड़ का आवंटन क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को नई परिभाषा देने का प्रयास है। यह अलग बात है कि इस बजट में पहली बार देश की अधिसंख्य जनता का कोई उल्लेख तक नहीं है। किसान, मजदूर, छात्र और मध्यमवर्ग दरकिनार है और रोजगार के सवाल पर भी पूरी तरह चुप्पी है।

वित्त मंत्री ने विशाल बदलाव के बजाय हल्का धक्का देने की रणनीति अपनाई है। उदाहरण के तौर पर, अरंडी की खली के उत्पादकों के लिए सीमा शुल्क में छूट देना या समुद्री क्षेत्र में पकड़ी गई मछलियों को विदेशी बंदरगाह पर उतरने पर भी निर्यात का दर्जा देना, ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी कदम हैं जो विशिष्ट उद्योगों की जटिलताओं को सुलझाते हैं।

डेटा सेंटर क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे देना और बायोफार्मा विनिर्माण के लिए 10,000 करोड़ रुपये का नया फंड बनाना भारत को भविष्य की तकनीक और दवाओं के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है। इसी तरह, दुर्लभ खनिजों के लिए ओडिशा, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में समर्पित कॉरिडोर बनाना भारत की सामरिक आत्मनिर्भरता के लिए अनिवार्य कदम है।

शेयर बाजार के उन सटोरियों के लिए यह बजट निराशाजनक रहा जो बूस्टर डोज की उम्मीद कर रहे थे। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस के कारोबार में सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स में की गई वृद्धि ने जल्द अमीर बनने की चाह रखने वाली भीड़ पर लगाम कसने का काम किया है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि वह सट्टेबाजी के बजाय वास्तविक और दीर्घकालिक निवेश को प्राथमिकता देती है।

मध्यम वर्ग के लिए फरवरी 2025 में किए गए आयकर संशोधनों का प्रभाव अभी भी महसूस किया जा रहा है, जिसमें 12 लाख तक की आय को प्रभावी रूप से कर मुक्त रखा गया है। बजट 2026 ने इन लाभों को बरकरार रखते हुए स्थिरता पर जोर दिया है, ताकि उपभोग की मांग बनी रहे। बजट की सबसे बड़ी कमजोरी वह धुंध है जिसमें इसकी बारीकियां खो जाती हैं।

वित्त मंत्री ने कई नई समितियों और फंडों की घोषणा की है—जैसे विकसित भारत में बैंकिंग के लिए समिति और शिक्षा से रोजगार तक का मिशन। लेकिन अतीत का अनुभव बताता है कि अर्बन चैलेंज फंड या पिछले बजट के मैन्युफैक्चरिंग मिशन जैसे विचार परिणामों में तब्दील होने में विफल रहे हैं।

रुपये के मूल्य में गिरावट, विदेशी संस्थागत निवेशकों का पलायन और निजी पूंजी निर्माण की धीमी गति जैसे ज्वलंत मुद्दों पर बजट में कोई स्पष्ट या आक्रामक रणनीति नहीं दिखी। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय बाजार की स्थिरता सोमवार को खुलने वाले वैश्विक सूचकांकों पर निर्भर करेगी।

बजट 2026 में विचारों और हस्तक्षेपों की कमी नहीं है, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कितनी पारदर्शिता के साथ इनका क्रियान्वयन करती है। सरकार को चाहिए कि वह आधे वित्तीय वर्ष के बाद एक एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश करे, जिसे शगुन रिपोर्ट कहा जा सकता है।

इससे घरेलू निवेशकों और वैश्विक व्यापारिक भागीदारों का भरोसा मजबूत होगा। यह बजट बिग बैंग न सही, लेकिन यदि यह अपने सूक्ष्म सुधारों को धरातल पर उतारने में सफल रहता है, तो यह विकसित भारत की ओर एक शांत लेकिन प्रभावी कदम साबित होगा। वशर्ते कि सरकार अपनी बातों पर मजबूती से टिकी रहे वरना बातों से मुकर जाना भी इस सरकार की पुरानी बीमारी है।