एकदम मतलब गजबे हो गया। विश्वमानव से डिमोशन हुआ तो सीधे तेली। वइसे यह बात भी सही साबित हो गयी कि समाज में जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी हिस्सेदारी वाली राहुल गांधी की बात बिल्कुल सही साबित हो गयी। समाज का एक वर्ग इसे मन से स्वीकार नहीं करता। इसी वजह से एक यूजीसी का मामला सामने आया तो लोगों के चेहरों पर लगा नकाब एक झटके में ही उतर गया।
भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने स्थगितादेश जारी कर सरकार को और अधिक परेशान होने से बचा लिया। लेकिन इसके बाद भी मौनी अमावस्या का विवाद अब भी सरकार के गले में हड्डी बनकर फंसा हुआ है। सोशल मीडिया में पहली बार ऐसा हो रहा है कि मोदी के समर्थक समझने जाने वाले अनेक लोगों ने अपना प्रोफाइल बंद कर लिया है क्योंकि उन्हें पहली बार सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी तरफ शंकराचार्य समर्थक दिनोंदिन आक्रामक तेवर अपना रहे हैं।
शंकराचार्य विवाद किसी कॉमेडी सर्कस के उस फिनाले जैसा है, जहाँ अंत में यह समझ नहीं आता कि आखिर में कौन किसके अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ कर रहा है। एक तरफ हमारे पूज्य शंकराचार्य जी हैं, जो धर्म की ध्वजा लेकर चल रहे हैं, और दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ की सरकार है, जिसे बुलडोजर न्याय वाले शब्दों से शायद बहुत अधिक प्यार हो गया है। पता नहीं यह बुलडोजर पूरी पार्टी को किसी गहरी खाई में धकेल देगी तो आखिर क्या होगा।
लेकिन इतना तो तय है कि अचानक से इन दोनों घटनाक्रमों ने बाबाओं, संतों से लेकर आम नागरिकों तक के चेहरों से नकाब हटाने का काम किया है। इसी बात पर एक फिल्मी गीत याद आने लगा है। फिल्म मेरे हुजूर के लिए इस गीत को लिखा था हसरत जयपुरी ने और संगीत में ढाला था शंकर जयकिशन ने। इसे मोहम्मद रफी ने अपना स्वर प्रदान किया था। गीत के बोल इस तरह है।
अपने रुख पे निगाह करने दो
खूबसूरत गुनाह करने दो
रुख से पर्दा हटाओ जान-ए-हया
आज दिल को तबाह करने दो
रुख से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर
जलबा फिर एक बार दिखा दो, मेरे हुज़ूर
वो मर्मरी से हाथ वो महका हुआ बदन
वो मर्मरी से हाथ वो महका हुआ बदन
टकराया मेरे दिल से, मुहब्बत का एक चमन
मेरे भी दिल का फूल खिला दो, मेरे हुज़ूर
रुख से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर
हुस्न-ओ-जमाल आपका शीशे में देख कर
हुस्न-ओ-जमाल आपका शीशे में देख कर
मदहोश हो चुका हूँ मैं जलवों की राह पर
ग़र हो सके तो होश में ला दो, मेरे हुज़ूर
रुख से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर
तुम हमसफ़र मिले हो मुझे इस हयात में -२
मिल जाए चाँद जैसे कोई सूनी रात में
जागे तुम कहाँ ये बता दो, मेरे हुज़ूर
रुख से ज़रा नक़ाब उठा दो, मेरे हुज़ूर
अब व्यंग्य की पराकाष्ठा तो तब हुई जब प्रशासन ने शंकराचार्य जी से ही पूछ लिया कि हुजूर, आप असली वाले शंकराचार्य ही हैं न? जरा डिग्री… मेरा मतलब है, प्रमाण दिखाइए! अब जिस देश में पीएचडी की डिग्रियां फोटोकॉपी की दुकानों पर बिकती हों, वहां सदियों पुरानी पीठ के उत्तराधिकारी से पहचान पत्र मांगना ऐसा ही है जैसे सूरज से उसकी टॉर्च की रसीद मांगना। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री की डिग्री पर संशय आज भी कायम है।
उधर यूजीसी के नए नियम मानो कास्ट-पॉलिटिक्स और एकेडमिक्स की ऐसी खिचड़ी हैं, जिसे चखने के बाद सवर्ण समाज के छात्रों को लग रहा है कि अब उन्हें कॉलेज में प्रवेश के लिए केवल अंक ही नहीं, बल्कि अदृश्य अपराध बोध का सर्टिफिकेट भी साथ लाना होगा।
इस विवाद का सबसे मजेदार पहलू वे अफसर रहे, जो अचानक अपनी कुर्सी छोड़कर क्रांतिकारी बन गए। बरेली से लेकर लखनऊ तक, अफसरों ने ऐसे इस्तीफे दिए जैसे वो सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि किसी ओटीटी प्लेटफॉर्म का सब्सक्रिप्शन कैंसल कर रहे हों। एक मजिस्ट्रेट साहब तो इतने आहत हुए कि उन्होंने चोटी (शिखा) खींचे जाने को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। वैसे, अगर चोटी खींचने पर इस्तीफे होने लगें, तो भारत के हर स्कूल का पीटीआई टीचर आज जेल में होता!
कुल मिलाकर, यह विवाद हमें यह सिखाता है कि भारत में शिक्षा और धर्म तब तक अधूरे हैं जब तक उनमें राजनीति का तड़का न लगे। यूजीसी चाहता है कि कैंपस में सब बराबर हों, और शंकराचार्य चाहते हैं कि सनातन की मर्यादा बनी रहे। बीच में फंसा है वो आम आदमी, जो यह सोच रहा है कि उसे अगले साल की स्कॉलरशिप मिलेगी या उसे भी अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए किसी मेले में धरना देना पड़ेगा।