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महिला आरक्षण कानून पर कांग्रेस ने कर दी मांग

संसद का कामकाज ठीक चलने के बाद नई पहल प्रारंभ

  • सर्वदलीय बैठक का आयोजन करे सरकार

  • रिजिजू ने कहा सहमति बनाना चाहिए

  • मोदी सरकार ने ही वादा किया था

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून, 2023) को जल्द लागू करने की कोशिशों के बीच केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच खींचतान तेज हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय आम सहमति बनाने का अनुरोध किया। इसके जवाब में कांग्रेस ने एक बार फिर दोहराया कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए।

वर्तमान कानून के अनुसार, महिला आरक्षण दो प्रमुख प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही लागू हो सकता है: पहली, जनगणना (जिसकी रिपोर्ट 2027 के मध्य तक आने की उम्मीद है) और दूसरी, परिसीमन (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण)। इन शर्तों के कारण 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने की समयसीमा अनिश्चित बनी हुई है, जो 2023 में कानून पारित होने के समय से ही विपक्ष की आलोचना का मुख्य केंद्र रहा है।

सूत्रों के अनुसार, सरकार अब जनगणना और परिसीमन की अनिवार्य शर्तों को हटाकर आरक्षण की प्रक्रिया को तेज करने पर विचार कर रही है। चर्चा है कि मौजूदा सत्र में सरकार कानून में संशोधन के लिए एक नया विधेयक ला सकती है, जिसमें सीटों के रोटेशन की व्यवस्था शामिल हो सकती है। यह 1996 की गीता मुखर्जी समिति की एक प्रमुख सिफारिश थी, जिसके तहत हर आम चुनाव के बाद आरक्षित सीटों को बदला जाएगा ताकि तीन चुनावों के बाद सभी निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षण का लाभ मिल सके।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार के पत्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि संसद द्वारा सर्वसम्मति से विधेयक पारित होने के 30 महीने बाद सरकार अब रोडमैप पर चर्चा की बात क्यों कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि संसदीय लोकतंत्र की परंपराओं का पालन करते हुए प्रधानमंत्री को स्वयं सभी दलों के साथ इस पर संवाद करना चाहिए।

इस कानून में बदलाव के लिए संविधान के अनुच्छेद 368(2) के तहत संशोधन करना होगा। इसके लिए संसद के प्रत्येक सदन में कुल सदस्यता के बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। वर्तमान में लोकसभा (240 सांसद) और राज्यसभा (103 सांसद) दोनों में ही भाजपा के पास अपने दम पर यह विशेष बहुमत नहीं है, जिससे इस ऐतिहासिक सुधार को आगे बढ़ाने के लिए विपक्षी दलों का सहयोग अनिवार्य हो जाता है।