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सरकार की आलोचना मेरा लोकतांत्रिक अधिकार

सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की शीर्ष अदालत में दलीली

  • सुनवाई में कपिल सिब्बल के तर्क

  • गलत तरीके से बयान पेश किये गये

  • खराब स्वास्थ्य का मुद्दा भी उठाया गया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः लद्दाख के प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गुरुवार को सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि सरकार की आलोचना करना और उसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह की भावनाएं देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं हैं, जिसके आधार पर उन्हें हिरासत में रखा जाए।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ के समक्ष वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे अंगमो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलीलें पेश कीं। सिब्बल ने कहा कि लद्दाख की प्राचीन प्रकृति को संरक्षित करने की आवश्यकता है और वहां के लोग पर्यावरण का विनाश नहीं चाहते।

सिब्बल ने तर्क दिया कि वांगचुक के खिलाफ हिंसा का कोई मामला नहीं है। उनकी पदयात्रा और अनशन अहिंसक कृत्य थे। हिरासत का आधार हिंसात्मक कृत्यों को होना चाहिए, न कि शांतिपूर्ण विरोध को। सिब्बल ने आरोप लगाया कि हिरासत का आदेश वांगचुक के बयानों को संदर्भ से बाहर निकालकर और चुनिंदा रूप से तैयार किया गया है। यह पूरी प्रक्रिया दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होती है।

उस आरोप का खंडन करते हुए जिसमें कहा गया था कि वांगचुक ने लद्दाखियों को सेना की मदद न करने के लिए उकसाया, सिब्बल ने कहा कि यह भाषा की कमी या जानबूझकर की गई विकृति के कारण हुई गलतफहमी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वांगचुक ने प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा वाले वीडियो भी जारी किए थे, जिन्हें अधिकारियों ने अनदेखा कर दिया।

सुनवाई के दौरान एक वीडियो का जिक्र आया जिसमें वांगचुक ने कथित तौर पर हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ बयान दिया था। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि यह एक रूपक था। वांगचुक ने कहा था कि जिस तरह राम ने सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराया और फिर उन्हें बाजार में अकेला छोड़ दिया, केंद्र सरकार ने लद्दाख को कश्मीर से अलग (मुक्त) तो किया, लेकिन संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा देने के अपने वादे को पूरा नहीं किया। सिब्बल ने कहा, यदि इन बयानों के आधार पर हिरासत में लिया जाता है, तो हमें बोलना ही बंद कर देना चाहिए।

उनकी पत्नी ने याचिका में आरोप लगाया कि वांगचुक को चुप कराने के लिए उनके एनजीओ का एफसीआरए प्रमाण पत्र रद्द किया गया और उन पर सीबीआई एवं आयकर विभाग की जांच शुरू की गई। अदालत को यह भी सूचित किया गया कि जेल में दूषित पानी के कारण वांगचुक के पेट में समस्या हो गई है, जिसके लिए उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है।