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दावोस में ट्रंप के बयान से अपमानित हो गये यूरोप के नेता

ब्रिटेन के लिए ट्रंप की कड़ी चेतावनी दे दी

दावोसः इस पूरे विवाद के केंद्र में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर हैं। कीर स्टार्मर ने पद संभालने के बाद से ही ट्रंप के प्रति चापलूसी और मेल-मिलाप की नीति अपनाई थी, ताकि राष्ट्रपति के अनिश्चित व्यवहार को संभाला जा सके। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर ब्रिटेन के डिएगो गार्सिया द्वीप को मॉरीशस को सौंपने के निर्णय की कड़ी आलोचना की है।

ट्रंप ने इसे अत्यंत मूर्खतापूर्ण कार्य करार देते हुए कहा कि ब्रिटेन बिना किसी कारण के एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सैन्य अड्डे वाली जगह को छोड़ रहा है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के उन कारणों में से एक बताया, जिसके आधार पर वे ग्रीनलैंड को खरीदने की अपनी मांग दोहरा रहे हैं।

हैरानी की बात यह है कि इसी सौदे को मई में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने ऐतिहासिक और स्मारकीय उपलब्धि बताया था। लेकिन प्रधानमंत्री स्टार्मर द्वारा ट्रंप की टैरिफ नीतियों और ग्रीनलैंड अधिग्रहण की धमकी को पूरी तरह गलत बताने के बाद, व्हाइट हाउस का रुख 180 डिग्री बदल गया। इस बीच, लेबर पार्टी की वरिष्ठ नेता एमिली थॉर्नबेरी ने कहा कि फिलहाल स्थिति को शांत रहकर और देखें और प्रतीक्षा करें की नीति अपनाकर ही संभाला जा सकता है।

सिर्फ ब्रिटेन ही नहीं, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी ट्रंप के निशाने पर आए। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर मैक्रों द्वारा भेजे गए एक निजी संदेश को सार्वजनिक कर दिया। इस संदेश में मैक्रों ने सीरिया और ईरान पर सहमति जताई थी, लेकिन ग्रीनलैंड पर ट्रंप के रुख पर सवाल उठाए थे।

यही नहीं, ट्रंप ने एआई द्वारा निर्मित एक तस्वीर साझा की, जिसमें वे व्हाइट हाउस में यूरोपीय नेताओं को उत्तरी अमेरिका का नक्शा दिखा रहे हैं। इस नक्शे में कनाडा और ग्रीनलैंड दोनों को अमेरिकी ध्वज (सितारों और पट्टियों) के रंग में रंगा गया है। यानी ये इलाके भी अमेरिका के हैं।

दावोस में होने वाले विश्व आर्थिक मंच से ठीक पहले ट्रंप के ये तेवर दिखाते हैं कि आने वाले समय में अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच दरार और गहरी हो सकती है। दरअसल पहले ही डोनाल्ड ट्रंप अपनी राय से अलग विचार रखने वाले यूरोपिय देशों पर भी टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं। अब इसका नतीजा यह हुआ है कि यह सारे देश और खास कर नाटो के सदस्य देश अपने स्थिति पर नये सिरे से विचार करने पर मजबूर हो गये हैं।