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एक शंकराचार्य के समर्थन में आये दूसरे शंकराचार्य

प्रयागराज के प्रशासन को परोक्ष इशारे से दी नसीहत

  • माघ मेला के स्नान से उपजा विवाद

  • प्रशासन ने शंकराचार्य को ही चुनौती दी

  • गोवर्धन पीठ के स्वामी का बयान स्पष्ट

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः माघ मेले के पावन अवसर पर गोवर्धन मठ, पुरी के पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने हाल के विवादों पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। त्रिवेणी मार्ग स्थित अपने शिविर में भक्तों को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म और शास्त्र की मर्यादा में उनके द्वारा लिए गए निर्णय अकाट्य होते हैं, जिन्हें देश का सर्वोच्च न्यायालय भी मान्यता देता है।

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के पद और हालिया विवादों से जुड़े सवालों पर पुरी शंकराचार्य ने एक संरक्षक की भूमिका निभाई। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपना लाडला कहकर संबोधित किया, जो उनके प्रति गहरे स्नेह और एक तरह के मौन समर्थन का संकेत देता है। हालांकि, पद की वैधता से जुड़े तकनीकी सवालों पर उन्होंने सधे हुए अंदाज में कहा कि जब यह विषय विधिवत उनके समक्ष आएगा, तभी वह इस पर कोई टिप्पणी करेंगे। फिलहाल यह मामला उनके पास विचाराधीन नहीं है।

मेला प्रशासन और अनशन विवाद पर रुख मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम नोज पर स्नान को लेकर प्रशासन और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच हुए गतिरोध और उसके बाद शुरू हुए अनशन पर भी स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि मेला प्रशासन को अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए और प्रभावित पक्ष उसका उचित उत्तर देगा। उन्होंने इस विवाद में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय इसे प्रशासनिक और विधिक प्रक्रिया पर छोड़ना ही उचित समझा।

मंगलवार को एक भावुक क्षण तब देखने को मिला जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने अनुयायियों के साथ गो रक्षा यात्रा निकाली। जैसे ही उनकी यात्रा स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के शिविर के द्वार पर पहुंची, अविमुक्तेश्वरानंद जी अपनी पालकी से उतरे और मुख्य द्वार से ही पुरी पीठाधीश्वर को दंडवत प्रणाम किया।

उस समय स्वामी निश्चलानंद भक्तों की शंकाओं का समाधान कर रहे थे। बाद में पूछे जाने पर पुरी पीठाधीश्वर ने सहजता से कहा कि उनका ध्यान उस समय वार्तालाप में था, इसलिए वह उस दृश्य को नहीं देख सके। स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के इस रुख ने सनातन धर्म के विभिन्न पीठों के बीच आपसी सम्मान और समन्वय की एक नई मिसाल पेश की है, जिससे श्रद्धालुओं के बीच सकारात्मक संदेश गया है।