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हाइब्रिड सेल्स अब व्यापारिक उत्पादन की ओर

सौर ऊर्जा में नई क्रांति से दुनिया को होगा फायदा

  • क्या है यह हाइब्रिड तकनीक?

  • 34 फीसद दक्षता पायी गयी है

  • हमारे जीवन पर क्या होगा असर?

राष्ट्रीय खबर

रांचीः दुनिया जब स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है, तब हाइब्रिड सोलर सेल्स का व्यावसायिक उत्पादन शुरू होना ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माना जा रहा है। दशकों से हम सौर ऊर्जा के लिए केवल सिलिकॉन-आधारित सोलर पैनलों पर निर्भर थे, लेकिन उनकी एक सीमा थी—वे सूर्य की रोशनी के केवल एक हिस्से को ही बिजली में बदल पाते थे। अब पेरोव्स्काइट नामक एक नए पदार्थ और पारंपरिक सिलिकॉन के मेल ने इस सीमा को तोड़ दिया है।

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पेरोव्स्काइट एक विशेष क्रिस्टल संरचना वाला पदार्थ है जो प्रकाश को सोखने में बेहद सक्षम होता है। टैंडम या हाइब्रिड सेल तकनीक में, सिलिकॉन की एक परत के ऊपर पेरोव्स्काइट की एक पतली परत लगाई जाती है। सिलिकॉन मुख्य रूप से लाल और इंफ्रारेड प्रकाश को सोखता है, जबकि पेरोव्स्काइट नीले और उच्च-ऊर्जा वाले प्रकाश को पकड़ता है। इस दोहरी कार्यप्रणाली के कारण, एक ही पैनल से कहीं अधिक बिजली पैदा होती है।

सामान्य सिलिकॉन पैनलों की अधिकतम व्यावहारिक दक्षता लगभग 24 प्रतिशत तक सीमित हो गई थी। प्रयोगशालाओं में शोध के बाद अब यह हाइब्रिड तकनीक 34 प्रतिशत से अधिक की दक्षता प्राप्त कर चुकी है। इसका सीधा मतलब यह है कि समान आकार के पुराने पैनल के मुकाबले ये नए हाइब्रिड पैनल लगभग 40 प्रतिशत ज्यादा बिजली पैदा करेंगे। 2026 की शुरुआत के साथ ही, कई वैश्विक कंपनियों ने इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया है।

अब कारों की छतों पर ही ऐसे हाइब्रिड सेल्स लगाए जा सकेंगे जो गाड़ी खड़ी होने पर उसे तेजी से चार्ज कर देंगे, जिससे बार-बार चार्जिंग स्टेशन जाने की जरूरत कम होगी। लैपटॉप बैग, स्मार्टफोन कवर और पोर्टेबल पावर बैंकों में इन सेल्स का इस्तेमाल इन्हें कहीं भी और कभी भी चार्ज करने की शक्ति देगा।

चूंकि ये पैनल कम जगह में ज्यादा बिजली बनाते हैं, इसलिए घरों और फैक्ट्रियों में सोलर सिस्टम लगवाने का खर्च और जगह दोनों कम हो जाएंगे। यह तकनीक न केवल जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद करेगी, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में हमारी आत्मनिर्भरता को भी एक नई ऊंचाई पर ले जाएगी।

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