अपनी जिद से पीछे हटने को तैयार नहीं है अमेरिकी राष्ट्रपति
कोपेनहेगेनः ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क साम्राज्य का एक स्वायत्त हिस्सा है, जनवरी 2026 में एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के केंद्र में आ गया है। पिछले 8 घंटों के दौरान इस संकट ने तब और भी गंभीर रूप ले लिया जब डेनमार्क के विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक और अत्यंत कड़ा बयान जारी करते हुए अमेरिका की खरीदने की इच्छा को न केवल सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन और संप्रभुता पर हमला करार दिया।
यह कूटनीतिक विवाद उस समय दोबारा भड़का जब डोनाल्ड ट्रंप के करीबी सलाहकारों और रिपब्लिकन कांग्रेस सदस्यों ने ग्रीनलैंड को 21वीं सदी की अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता बताते हुए ग्रीनलैंड एनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट जैसे विधायी प्रस्तावों की चर्चा शुरू कर दी।
अमेरिका की इस असाधारण रुचि के पीछे कई ठोस रणनीतिक और आर्थिक कारण हैं। ग्रीनलैंड के भूगर्भ में विशाल और अभी तक अछूते प्राकृतिक संसाधनों का भंडार है, जिसमें विशेष रूप से दुर्लभ पृथ्वी खनिज शामिल हैं। ये खनिज आधुनिक तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहनों और उन्नत हथियार प्रणालियों के निर्माण के लिए अपरिहार्य हैं, और वर्तमान में इन पर चीन का वर्चस्व है।
इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए शिपिंग रूट्स (समुद्री मार्ग) खुल रहे हैं। ये मार्ग न केवल व्यापारिक दृष्टि से छोटे और सस्ते हैं, बल्कि भविष्य के वैश्विक व्यापार के मुख्य धमनी बन सकते हैं। अमेरिका को डर है कि यदि उसने यहाँ अपनी सैन्य और राजनीतिक उपस्थिति को अधिग्रहण के माध्यम से स्थायी नहीं किया, तो रूस और चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देश इस क्षेत्र में अपना स्थायी आधार बना लेंगे, जो सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होगा।
इस स्थिति पर डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकार का रुख अत्यंत सख्त है। उन्होंने अमेरिका की इस पेशकश को बेतुका और अपनी जनता के आत्मसम्मान का अपमान बताया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने चेतावनी दी है कि ग्रीनलैंड कोई वस्तु नहीं है जिसे बेचा या खरीदा जा सके।
यूरोपीय संघ ने भी इस मुद्दे पर डेनमार्क के साथ पूर्ण एकजुटता व्यक्त की है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने स्पष्ट किया है कि संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। यह तनाव केवल बयानों तक सीमित नहीं रहा है। ट्रंप प्रशासन ने धमकी दी है कि यदि डेनमार्क ग्रीनलैंड पर सौदे के लिए तैयार नहीं होता है, तो 1 फरवरी 2026 से डेनमार्क सहित उन सभी यूरोपीय देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाएगा जो ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट उत्तर अटलांटिक संधि संगठन के भीतर एक गहरी दरार पैदा कर रहा है। डेनमार्क, जो अमेरिका का एक दशकों पुराना और वफादार रक्षा सहयोगी है, अब खुद को अपने ही सबसे करीबी दोस्त द्वारा आर्थिक और राजनीतिक रूप से धमकाया हुआ महसूस कर रहा है।
नाटो के अन्य सदस्य देशों, जैसे जर्मनी और फ्रांस, ने भी इस पर चिंता जताई है कि यदि अमेरिका अपने ही सहयोगियों की संप्रभुता का सम्मान नहीं करेगा, तो गठबंधन का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। जहाँ ट्रंप प्रशासन इस पूरे विषय को एक विशाल रियल एस्टेट सौदे और अमेरिकी सुरक्षा के लिए एक व्यापारिक निवेश की तरह देख रहा है, वहीं यूरोप के लिए यह राष्ट्रीय गौरव, लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्कटिक के संवेदनशील पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा बन गया है।