पुराने मित्र देशों के बीच तनातनी का नया दौर आगे बढ़ा
वाशिंगटनः वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय एक अत्यंत अस्थिर और खतरनाक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ वाशिंगटन और ब्रुसेल्स के बीच बढ़ता तनाव एक पूर्ण आर्थिक युद्ध में बदलने की कगार पर है। पिछले कुछ घंटों के भीतर वाशिंगटन से आए आधिकारिक बयानों और ट्रुथ सोशल पर डोनाल्ड ट्रंप की पोस्ट्स ने न केवल यूरोपीय बाजारों में हलचल मचा दी है, बल्कि वैश्विक निवेशकों की रातों की नींद उड़ा दी है।
ट्रंप प्रशासन के नवनियुक्त व्यापार दूत और ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने यूरोपीय संघ को स्पष्ट और कठोर शब्दों में चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि यदि यूरोपीय संघ ने अमेरिका द्वारा प्रस्तावित टैरिफ के खिलाफ किसी भी प्रकार की जवाबी कार्रवाई या जिसे ट्रेड बाज़ूका कहा जा रहा है, उसे अंजाम दिया, तो अमेरिका अपने आर्थिक प्रहार को और भी अधिक घातक बना देगा।
इस भारी विवाद की जड़ में डोनाल्ड ट्रंप की बहुचर्चित अमेरिका फर्स्ट नीति का दूसरा संस्करण है। इस नीति के तहत, ट्रंप ने हाल ही में घोषणा की है कि 1 फरवरी 2026 से यूरोपीय कारों, स्टील, एल्युमीनियम और प्रमुख कृषि उत्पादों पर 10 फीसद का प्रारंभिक आयात शुल्क लगाया जाएगा।
यही नहीं, उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनलैंड के अधिग्रहण या व्यापार असंतुलन जैसे मुद्दों पर समझौता नहीं हुआ, तो यह टैरिफ जून 2026 तक बढ़कर 25 और अंततः 100 प्रतिशत तक जा सकता है। यूरोपीय संघ ने भी इसके जवाब में कड़ा रुख अपनाते हुए संकेत दिया है कि वे अमेरिकी टेक दिग्गजों, क्रिप्टोकरेंसी फर्मों और हार्ले-डेविडसन जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी ब्रांडों पर भारी जवाबी शुल्क लगाएंगे।
विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह व्यापार युद्ध वास्तव में शुरू होता है, तो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 1 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, जो कि कोरोना महामारी के बाद के रिकवरी दौर के लिए एक बड़ा झटका होगा। इस स्थिति में जर्मनी की हालत सबसे अधिक नाजुक बनी हुई है।
जर्मनी, जो यूरोप का आर्थिक इंजन माना जाता है और जिसकी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ऑटोमोबाइल निर्यात पर टिका है, इस टैरिफ युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित होने वाला देश है। जर्मन ऑटो एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी शुल्क से उनके निर्यात में अरबों डॉलर की कमी आएगी और बड़े पैमाने पर छंटनी की नौबत आ सकती है।
यूरोपीय केंद्रीय बैंक की प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड ने भी अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि व्यापार में यह अनिश्चितता न केवल विकास दर को 0.9 फीसद तक गिरा सकती है, बल्कि ऊर्जा और आयातित सामानों की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति (Inflation) को फिर से अनियंत्रित कर सकती है।
दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन का तर्क अडिग है। उनका कहना है कि वे केवल उस ऐतिहासिक व्यापार असंतुलन को ठीक कर रहे हैं, जिसने दशकों से अमेरिकी कामगारों और निर्माताओं के हितों को नुकसान पहुँचाया है। अमेरिका का मानना है कि टैरिफ एक ऐसा हथियार है जो अंततः विदेशी कंपनियों को अमेरिका के भीतर कारखाने लगाने और नौकरियां पैदा करने के लिए मजबूर करेगा। अब पूरी दुनिया की नजरें दावोस में होने वाली संभावित वार्ताओं पर टिकी हैं, जहाँ शायद इस आर्थिक तूफान को रोकने का कोई रास्ता निकल सके।