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भारत और ईयू के बीच ऐतिहासिक व्यापार समझौता

दावोस में जारी विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन से सूचना आयी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः दावोस, स्विट्जरलैंड में आयोजित हो रहे विश्व आर्थिक मंच 2026 के वार्षिक सम्मेलन से वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के लिए एक अत्यंत उत्साहजनक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। पिछले 8 घंटों के भीतर हुई उच्च-स्तरीय कूटनीतिक हलचलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच बहुप्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और भारतीय व्यापारिक प्रतिनिधियों व मंत्रियों के बीच हुई सघन बैठकों के बाद जारी संकेतों से यह सुनिश्चित हो गया है कि दोनों पक्ष अब एक ऐतिहासिक समझौते के क्रियान्वयन के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

यह समझौता कोई साधारण व्यापारिक संधि नहीं है, बल्कि दशकों के कूटनीतिक गतिरोध को समाप्त करने वाली एक बड़ी उपलब्धि है। पिछले कई वर्षों से यह वार्ता डेटा सुरक्षा नियमों, कृषि उत्पादों के लिए बाजार पहुँच, ऑटोमोबाइल पर उच्च आयात शुल्क और भारतीय पेशेवरों के लिए वीज़ा मानदंडों जैसे जटिल मुद्दों पर अटकी हुई थी।

हालाँकि, 2026 की बदलती वैश्विक भू-राजनीति ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। चीन के प्रति बढ़ती वैश्विक अविश्वास की भावना और डी-रिस्किंग की नीति ने यूरोप को एक विश्वसनीय, लोकतांत्रिक और बड़े बाजार वाले विकल्प की तलाश करने पर मजबूर कर दिया है, जहाँ भारत एक स्वाभाविक भागीदार के रूप में उभरा है।

इस समझौते के आर्थिक निहितार्थ व्यापक और दूरगामी हैं। भारत के लिए यह समझौता उसके प्रमुख निर्यात क्षेत्रों जैसे कपड़ा, रत्न एवं आभूषण, और सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं के लिए यूरोप के 27 देशों के विशाल बाजार के दरवाजे पूरी तरह खोल देगा। इससे न केवल भारत का निर्यात बढ़ेगा, बल्कि लाखों नए रोजगार भी पैदा होंगे। दूसरी ओर, यूरोपीय कंपनियों को भारत के तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग, उपभोक्ता बाजार और उभरते हुए विनिर्माण क्षेत्र में बड़ी रियायतें और आसान पहुँच मिलेगी। विशेष रूप से यूरोपीय शराब, डेयरी उत्पाद और उच्च-तकनीकी मशीनरी के लिए भारतीय बाजार की बाधाएं कम होंगी।

आर्थिक लाभों से परे, विशेषज्ञ इस समझौते को एक रणनीतिक साझेदारी के रूप में देख रहे हैं। वर्तमान वैश्विक अस्थिरता और व्यापारिक युद्धों की धमकियों के बीच, यूरोप अब भारत को केवल एक व्यापारिक भागीदार नहीं, बल्कि एक स्थिर और नियम-आधारित लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में देख रहा है।

यह समझौता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए एक नए ध्रुव का काम करेगा। यदि यह समझौता, जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा है, अगले कुछ हफ्तों में आधिकारिक तौर पर हस्ताक्षरित हो जाता है, तो इसे 2026 की सबसे बड़ी वैश्विक आर्थिक घटना माना जाएगा। इससे दोनों क्षेत्रों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में अरबों डॉलर की वृद्धि होने की उम्मीद है, जो वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच एक सुरक्षा कवच (Buffer) के रूप में कार्य करेगा।