यूके ने वहां भेजा है सिर्फ एक सैनिक
लंदनः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड को खरीदने की मांग ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है। यूरोपीय संघ ने ट्रंप की इस मांग का कड़ा विरोध किया है, जिसके जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति ने यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी और नीदरलैंड सहित कई यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ (आयात शुल्क) लगा दिया है। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो वे इस शुल्क को बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर देंगे।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर घोषणा करते हुए कहा, संयुक्त राज्य अमेरिका डेनमार्क या उन देशों के साथ बातचीत के लिए तुरंत तैयार है जिन्होंने सब कुछ जोखिम में डाल दिया है, बावजूद इसके कि हमने उनके लिए बहुत कुछ किया है। उनका इशारा उन यूरोपीय देशों की ओर था जो ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावों का विरोध कर रहे हैं।
इसके जवाब में डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड और फिनलैंड ने एक संयुक्त बयान जारी कर चेतावनी दी है कि ट्रंप की धमकियां ट्रांसअटलांटिक संबंधों को कमजोर करती हैं और एक खतरनाक गिरावट का जोखिम पैदा करती हैं। यूरोपीय देशों ने कहा कि ये टैरिफ पूरी तरह से गलत हैं और इसका फायदा चीन और रूस को मिल सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लोगों के साथ पूरी एकजुटता के साथ खड़े हैं और संप्रभुता के सिद्धांतों से समझौता नहीं करेंगे।
डेनमार्क के क्षेत्र पर किसी भी संभावित जबरन कब्जे के डर से, कई यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड में अपने सैन्य कर्मियों को तैनात कर दिया है। हालांकि यह संख्या कम है, लेकिन इसका कूटनीतिक संदेश बहुत बड़ा है। जारी सूची के मुताबिक फ्रांस के 15, जर्मनी के 13, स्वीडन के 3, नॉर्वे के 2 सैन्य कर्मी, फिनलैंड के 2 सैन्य संपर्क अधिकारी, नीदरलैंड का 1 नौसैनिक अधिकारी और यूनाइटेड किंगडम के एक सैन्य कर्मी की तैनाती हुई है।
1951 के एक रक्षा समझौते के तहत अमेरिका की ग्रीनलैंड तक पहले से ही पहुंच है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वहां अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम हुई है। ट्रंप का तर्क है कि चीन और रूस पर नजर रखने के लिए ग्रीनलैंड का पूर्ण अमेरिकी नियंत्रण में होना आवश्यक है। उन्होंने हाल ही में कहा था, यदि ग्रीनलैंड संयुक्त राज्य अमेरिका के हाथों में होता है, तो नाटो कहीं अधिक दुर्जेय और प्रभावी बन जाएगा। इससे कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती यह रस्साकशी केवल जमीन के एक टुकड़े के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के समुद्री रास्तों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई बनती जा रही है।