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कृषि की सरकारी उपेक्षा एक अदृश्य खतरा

कोई भी गाँव में नहीं रहना चाहता। देश के अधिकांश ग्रामीण इलाकों से यह उत्तर मिल जाता है। खासकर किसान इसे और बेहतर तरीके से बताते हैं। कुछ लोग कहते हैं, जो लोग गाँव नहीं छोड़ सकते, उन्हें हमारी तरह दुख सहते रहना होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन के साथ शुरू हुआ था। इस दौरान किसानों की आत्महत्याओं का लंबा सिलसिला चला।

वैश्वीकरण के दौर में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास के बीज लेकर यहाँ उतरीं, जिन्होंने भारी पैदावार का वादा किया था। उनके पीछे-पीछे कृषि-रसायन क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां नए कीटनाशक लेकर आईं। उच्च आय, बेहतर पैदावार, सुनिश्चित सिंचाई और एक खुशहाल जीवन के तमाम वादे अंततः एक मृगतृष्णा साबित हुए।

किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया और एक सामान्य जीवन जीने की उनकी हताशा भी गहरी होती गई। पिछले 25 वर्षों के भीतर, गाँव की आधी आबादी पलायन कर चुकी है। आज गाँवों का युवा खेती नहीं करना चाहता; इसका एक सामाजिक कारण यह भी है कि कोई उनसे शादी करने को तैयार नहीं होता।

वे वैकल्पिक रोजगार खोजने में असमर्थ हैं क्योंकि उन्हें अपने से बेहतर शिक्षित, गतिशील और अत्यधिक कुशल शहरी साथियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। यहाँ तक कि बड़े किसान भी अब अपनी जमीन बेचकर शहरों की ओर पलायन करना चाहते हैं। यदि महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य के ग्रामीण इलाकों का यह हाल है, तो ओडिशा, झारखंड, बिहार और अन्य गरीब राज्यों के किसान वर्गों की स्थिति की कल्पना करना भी डरावना है।

यदि इस सदी की पहली तिमाही ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विनाशकारी रही है—जिसमें लगभग 4,50,000 किसानों ने आत्महत्या की, ग्रामीण-शहरी पलायन बढ़ा और कर्ज का बोझ चरम पर पहुँचा—तो अगली तिमाही हमारे लिए क्या संकेत दे रही है? करोड़ों छोटे और पारिवारिक किसानों का भविष्य अब केवल नीतिगत चिंता का एक मामूली हिस्सा नहीं रह गया है; बल्कि यह इस बात की परीक्षा है कि हम असमानता, जलवायु परिवर्तन और अनुचित बाजारों का सामना कैसे करते हैं।

यह सवाल है कि क्या बढ़ती गर्मी और बढ़ते तापमान वाली इस दुनिया में हमारी खाद्य प्रणालियाँ सामाजिक, पारिस्थितिक और आर्थिक रूप से व्यवहार्य रह पाएंगी। वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब के अनुसार, भारत के शीर्ष 1 प्रतिशत लोग राष्ट्रीय आय का 22.6 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं और कुल संपत्ति का लगभग 40 फीसद उनके पास है। इसके विपरीत, निचली 50 प्रतिशत आबादी, जिसमें सभी जातियों और संप्रदायों के ग्रामीण किसान शामिल हैं, को कुल आय का मुश्किल से 15 फीसद प्राप्त होता है।

अब विचार करें कि इस असमान अर्थव्यवस्था में कृषि कहाँ खड़ी है। आज भी कृषि लगभग 40-50 फीसद कार्यबल को सहारा देती है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान मात्र 16-18 प्रतिशत है। अधिकांश किसानों के पास आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है, और सेवा क्षेत्र, जो जीडीपी में सबसे अधिक योगदान देता है, में उनकी कोई हिस्सेदारी नहीं है।

विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चलता है कि प्रति एकड़ रिटर्न घट रहा है, और अब खेती की लागत में मजदूरी दरें कुल आय से भी आगे निकल रही हैं। बैंकिंग डेटा की हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि कृषि क्षेत्र में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स लगातार बढ़ रहे हैं। जब फसलें बर्बाद होती हैं, तो कर्ज चुकाना असंभव हो जाता है, जिससे जमीन खोने या खेती छोड़ने की नौबत आ जाती है।

जलवायु परिवर्तन ने इस संरचनात्मक कमजोरी को एक प्रणालीगत संकट में बदल दिया है। वर्ष 2025 में, भारत ने साल के अधिकांश दिनों में भीषण मौसम की घटनाओं का अनुभव किया। हीटवेव (लू) समय से पहले आई और लंबे समय तक चली; बारिश तीव्र लेकिन अनियमित हो गई, और लाखों हेक्टेयर फसल बाढ़, सूखे और बेमौसम बारिश की भेंट चढ़ गई।

ये झटके अब एक ही कृषि चक्र के भीतर बार-बार आ रहे हैं। नवंबर 2025 में, सूखा प्रभावित सोलापुर के कारी गाँव में, जो तुलनात्मक रूप से समृद्ध गन्ना-अंगूर बेल्ट है, पिछले 18 महीनों में 30 किसानों ने आत्महत्या की—जिनमें से अधिकांश पीड़ित अपनी उम्र के 20वें साल में थे। यह एक असहज प्रश्न खड़ा करता है: क्या भारत की भविष्य की खाद्य प्रणाली में छोटे किसानों का अस्तित्व बचेगा?

सरकारी नीतियां कहती हैं कि वे महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत इशारा करती है। फिर भी, छोटे किसान भारत की खाद्य सुरक्षा के केंद्र में हैं क्योंकि वे अनाज, दालों और सब्जियों का एक बड़ा हिस्सा पैदा करते हैं। वे स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बनाए रखते हैं और विविध कृषि-पारिस्थितिक परिदृश्यों का प्रबंधन करते हैं। अब बाकी चीजों को छोड़ भी दें तो यह सवाल गंभीर है कि जब किसान ही नहीं रहेंगे तो सरकार और देश के उद्योगपति किस कारखाने में लोगों के लिए अनाज पैदा करेंगे और लोगों को पेट कैसे भरेगा।