डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों के खिलाफ खड़े हो रहे मित्र देश
नूकः ग्रीनलैंड की बर्फीली वादियों में इन दिनों राजनीतिक और कूटनीतिक पारा अपने चरम पर है। ऐतिहासिक रूप से शांत रहने वाला यह द्वीप अब एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय खींचतान का केंद्र बन गया है, जिसने शीत युद्ध की पुरानी यादों को ताजा कर दिया है। ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क साम्राज्य के भीतर एक स्वायत्त क्षेत्र है, वर्तमान में अमेरिका और यूरोपीय शक्तियों के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का मुख्य बिंदु बन चुका है।
इस संकट की शुरुआत तब हुई जब वाशिंगटन से ग्रीनलैंड के संभावित विलय या उस पर प्रत्यक्ष नियंत्रण को लेकर तीखे बयान सामने आने लगे। अमेरिका का तर्क है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से ग्रीनलैंड पर उसका प्रभाव अनिवार्य है। अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए, ग्रीनलैंड को केवल एक सहयोगी के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हालांकि, इन बयानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धमकी के रूप में देखा जा रहा है, जिससे दशकों पुराने नाटो गठबंधन के भीतर भी दरारें दिखने लगी हैं।
अमेरिका के इस आक्रामक रुख ने यूरोपीय संघ और विशेष रूप से नॉर्डिक देशों को सतर्क कर दिया है। जवाब में, कई यूरोपीय देशों ने ग्रीनलैंड और उसके आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाने के लिए अतिरिक्त टुकड़ियाँ भेजने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। यूरोपीय नेताओं का स्पष्ट मानना है कि ग्रीनलैंड की क्षेत्रीय अखंडता और डेनमार्क की संप्रभुता के साथ कोई भी समझौता पूरे यूरोप की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है। सैन्य तैनाती का मुख्य उद्देश्य किसी भी संभावित उकसावे को रोकना और यह संदेश देना है कि यूरोप अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
इस विवाद के मूल में केवल राजनीति नहीं, बल्कि भूगोल और अर्थशास्त्र भी है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे दुनिया के सामने दो बड़ी संभावनाएं खुली हैं। बर्फ पिघलने से ऐसे छोटे समुद्री रास्ते बन रहे हैं, जो एशिया, यूरोप और अमेरिका के बीच व्यापारिक दूरी को काफी कम कर सकते हैं। ग्रीनलैंड की भूमि के नीचे दुर्लभ मृदा तत्व, तेल और गैस के विशाल भंडार दबे होने का अनुमान है। इन संसाधनों पर नियंत्रण भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेगा।
यूरोपीय संघ ने अमेरिका के दावों को अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला उल्लंघन बताया है। डेनमार्क सरकार ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और उसकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाना चाहिए। वर्तमान में, आर्कटिक क्षेत्र एक सैन्य छावनी में बदलता दिख रहा है, जहाँ कूटनीतिक मेज की जगह अब युद्धपोत और सैनिकों की संख्या पर चर्चा हो रही है। यदि तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह विवाद न केवल आर्कटिक की शांति भंग करेगा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा समीकरणों को भी स्थायी रूप से बदल देगा।