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चीन ने अपनी कंपनियों को सुरक्षा संबंधी निर्देश दिये

अमेरिकी और इजरायली सॉफ्टवेयर छोड़ दें

बीजिंगः वैश्विक महाशक्ति बनने की होड़ में चीन ने अब अपने सुरक्षा ढांचे से पश्चिमी प्रभाव को पूरी तरह जड़ से मिटाने का निर्णय लिया है। चीनी सरकार ने एक कड़ा फरमान जारी करते हुए अपनी सभी प्रमुख सरकारी संस्थाओं, बुनियादी ढांचा प्रदाताओं और निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों को अमेरिकी और इजरायली साइबर सुरक्षा सॉफ्टवेयर का उपयोग तत्काल बंद करने का निर्देश दिया है।

चीनी अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर प्रोग्रामों में बैकडोर या गुप्त खामियां हो सकती हैं। बीजिंग का तर्क है कि इन सुरक्षा छिद्रों का उपयोग करके विदेशी खुफिया एजेंसियां—जैसे कि अमेरिकी एजेंसी या इजरायली मोसाद, चीन के संवेदनशील डेटा, पावर ग्रिड, परिवहन प्रणाली और सैन्य संचार में सेंध लगा सकती हैं। यह कदम विशेष रूप से डिलीट अमेरिका रणनीति का हिस्सा है, जिसे आधिकारिक तौर पर डॉक्यूमेंट 79 के रूप में भी जाना जाता है।

इस निर्णय की सीधी गाज दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों पर गिरी है। क्राउडस्ट्राइक और माइक्रोसॉफ्ट: साइबर सुरक्षा और ओएस क्षेत्र में इनके प्रभुत्व को अब चीन में स्वदेशी विकल्पों से बदला जा रहा है। चेक पॉइंट इजरायल की यह दिग्गज कंपनी साइबर सुरक्षा के मामले में विश्व स्तर पर अग्रणी है, लेकिन चीन अब विदेशी फायरवॉल पर निर्भरता खत्म करना चाहता है।

चीन अब इन कंपनियों के स्थान पर अपनी घरेलू कंपनियों जैसे हुवावे और क्वीन के सुरक्षा टूल्स को अनिवार्य कर रहा है। यह फैसला अचानक नहीं लिया गया है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने चीन को उन्नत सेमीकंडक्टर (चिप) की आपूर्ति पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसके जवाब में चीन ने अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना लिया है। चीन अब केवल एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक स्वदेशी इकोसिस्टम बनाना चाहता है जहाँ ऑपरेटिंग सिस्टम से लेकर डेटा सर्वर तक सब कुछ मेड इन चाइना हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला दो हिस्सों में बंट सकती है। इसे स्प्लिंटरनेट की शुरुआत कहा जा रहा है, जहाँ एक तरफ पश्चिमी मानक होंगे और दूसरी तरफ चीनी तकनीक। जहाँ एक ओर चीन इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक बता रहा है, वहीं आलोचकों का तर्क है कि विदेशी सॉफ्टवेयर को हटाकर चीन अपने नागरिकों और कंपनियों पर सरकार की निगरानी को और अधिक मजबूत कर लेगा। यह कदम भविष्य में वैश्विक व्यापार और साइबर कूटनीति की दिशा तय करेगा।