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गहरे समुद्र के दो अनजाने वायरसों की जानकारी मिली

व्हेल और ओर्का में मिले ये विषाणु

  • कैरेबियन क्षेत्र में इनका पता चला

  • दोनों का नामकरण भी किया गया

  • वायरसों पर गहन शोध शेष है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः उत्तरी अटलांटिक महासागर के कैरिबियन क्षेत्र में शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने शॉर्ट-फिन्ड पायलट व्हेल और ओर्का (किलर व्हेल) में दो पहले से अज्ञात वायरसों की खोज की है।

इस शोध दल में एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी (एएसयू), कोस्टल कैरोलिना यूनिवर्सिटी और अमेरिका की द यूनिवर्सिटी ऑफ द साउथ के वैज्ञानिकों और छात्रों के साथ-साथ सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस, वेस्ट इंडीज विश्वविद्यालय (बारबाडोस), केप टाउन विश्वविद्यालय (दक्षिण अफ्रीका) और पाश्चर संस्थान (फ्रांस) के विशेषज्ञ शामिल थे। यह पहली बार है जब इस क्षेत्र के समुद्री स्तनधारियों (सिटेशियन) में सर्कोवायरस का पता चला है।

यह अध्ययन नोवेल सर्कोवायरस आइडेंटिफाइड इन शॉर्ट-फिन्ड पायलट व्हेल एंड ओर्का शीर्षक से प्रकाशित हुआ है, जिसका नेतृत्व एएसयू के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के वायरोलॉजिस्ट अरविंद वरसानी ने किया। शोधकर्ताओं ने मृत व्हेलों के संग्रहीत ऊतक नमूनों का विश्लेषण करने के लिए हाई-थ्रूपुट जेनेटिक सीक्वेंसिंग का उपयोग किया। ये नमूने सेंट विंसेंट द्वीप पर रसेल फील्डिंग और पारंपरिक व्हेल शिकारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के माध्यम से एकत्र किए गए थे।

विश्लेषण के दौरान वैज्ञानिकों ने सात पूर्ण सर्कोवायरस जीनोम बरामद किए। इनमें से पांच जीनोम शॉर्ट-फिन्ड पायलट व्हेल से और दो ओर्का से प्राप्त हुए। ये वायरस दो पूरी तरह से नई प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें शोधकर्ताओं ने शोफिन सर्कोवायरस और ओर्सिन सर्कोवायरस नाम दिया है। ये दोनों प्रजातियां प्रशांत महासागर में पहले खोजी गई एकमात्र बीक्ड व्हेल सर्कोवायरस से काफी भिन्न हैं।

इन वायरसों की विशिष्टता इनके कैप्सिड प्रोटीन (बाहरी आवरण) में निहित है। शोधकर्ताओं ने पाया कि इनके बाहरी हिस्से में असामान्य रूप से बड़े लूप, विशेष रूप से ई-एफ लूप मौजूद हैं। यह संरचना सुअर में पाए जाने वाले सर्कोवायरस की तुलना में लगभग दोगुनी लंबी है। अनुवांशिक विश्लेषण से यह भी पता चलता है कि व्हेल और अन्य समुद्री स्तनधारियों में पाए जाने वाले सर्कोवायरस एक विशिष्ट मोनोफाइलेटिक समूह बनाते हैं।

वर्तमान आंकड़ों के आधार पर यह अध्ययन सुझाव देता है कि ये वायरस आधुनिक सिटेशियन के पूर्वजों को उनके विकासवादी इतिहास के शुरुआती दौर से ही संक्रमित कर रहे होंगे। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समझने के लिए और अधिक डेटा की आवश्यकता है कि ये वायरस कैसे फैलते हैं और क्या ये व्हेल के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।

पहले के शोधों ने संकेत दिया था कि ये वायरस प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं, जैसा कि कुछ भूमि पर रहने वाले जानवरों और पक्षियों में देखा गया है। भविष्य के शोध यह स्पष्ट करेंगे कि ये वायरस समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को कैसे प्रभावित कर रहे हैं।

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