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जिद और जिम्मेदारी टालने का खेल

पिछले दिनों भारतीय संसद के दोनों सदनों में एक बड़ा विधायी बदलाव देखने को मिला, जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम को निरस्त कर उसके स्थान पर एक नया जटिल नाम वाला कानून विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी जी राम जी अधिनियम पारित कर दिया गया।

सरकार के इस कदम ने कई विशेषज्ञों और नागरिक समाज को हैरत में डाल दिया है कि आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि काम के अधिकार पर आधारित एक ऐसी योजना को बदल दिया गया, जिसने तमाम चुनौतियों के बावजूद पिछले दो दशकों में एक विश्वसनीय ट्रैक रिकॉर्ड बनाया था। संसद में विपक्ष के भारी विरोध के बीच, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि अधिनियम के नाम से महात्मा गांधी का नाम हटाना राष्ट्रपिता का अपमान है।

उन्होंने दलील दी कि गांधी जी का नाम 2005 के मूल कानून का हिस्सा नहीं था। चौहान ने आगे मनरेगा की आलोचना करते हुए इसे एक फिजूलखर्ची वाली योजना बताया, जिसमें सार्थक सामाजिक संपत्ति बनाए बिना मजदूरी के रूप में भारी धनराशि बांटी जा रही थी। दूसरी ओर, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।

उन्होंने सरकार पर गरीबों के लिए पिछले 20 वर्षों से जारी कार्य गारंटी को एक झटके में ध्वस्त करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, यह नया कानून अधिकारों पर आधारित और मांग-संचालित गारंटी को खत्म कर इसे दिल्ली से नियंत्रित एक राशन योजना में बदल देता है। यह मूल रूप से राज्य-विरोधी और गांव-विरोधी है।

मनरेगा का ऐतिहासिक प्रदर्शन और सुरक्षा कवच 2005 में पारित नरेगा प्रत्येक वित्तीय वर्ष में अकुशल शारीरिक श्रम करने के इच्छुक ग्रामीण परिवारों को कम से कम 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता था। तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार संभवतः 1972 की महाराष्ट्र रोजगार गारंटी योजना से प्रेरित थी, जिसने पहली बार काम के अधिकार को मान्यता दी थी।

इस योजना ने पंचायती राज संस्थाओं को सशक्त बनाया, क्योंकि ग्राम सभाओं में ही परियोजनाओं का निर्णय होता था। मनरेगा की असली ताकत 2020-2022 के महामारी काल के दौरान दिखाई दी। जब लगभग 13.9 करोड़ प्रवासी श्रमिक शहरों से अपने गांवों की ओर लौटे, तब नरेगा उनके लिए एकमात्र सहारा बना। सरकार ने स्वयं आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत इसके बजट को बढ़ाकर 1 लाख करोड़ रुपये कर दिया था और मजदूरी दर 182 रुपये से बढ़ाकर 202 रुपये कर दी थी।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, कोविड के दौरान लौटने वाले प्रवासियों की आय के नुकसान की 20 प्रतिशत से 80 फीसद तक भरपाई इसी योजना से हुई थी। नया जी राम जी अधिनियम मनरेगा की उन बुनियादी विशेषताओं को खत्म करता है जो इसे विशिष्ट बनाती थीं। भाजपा सरकार की योजनाओं के नाम बदलने की पुरानी प्रवृत्ति रही है लेकिन महात्मा गांधी का नाम हटाना अधिक विवादास्पद है।

गांधी जी हमेशा से वंचितों के उत्थान के लिए एक सर्वदलीय प्रतीक रहे हैं। सबसे अधिक चिंताजनक काम के अधिकार के सिद्धांत का कमजोर होना है। पहले यह योजना मांग-संचालित थी, यानी जब बेरोजगार काम मांगता था, तो राज्य उसे काम और धन देने के लिए कानूनी रूप से बाध्य था। नए कानून के तहत, काम अब मांग पर नहीं बल्कि पूर्व-अनुमोदित योजनाओं के आधार पर दिया जाएगा।

इसका सीधा अर्थ है कि श्रमिकों को काम तभी मिलेगा जब कोई परियोजना उपलब्ध होगी। फंडिंग के ढांचे में भी एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब तक यह लगभग पूरी तरह से केंद्र प्रायोजित योजना थी, लेकिन अब इसमें केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 का अनुपात तय किया गया है। गरीब राज्यों के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी।

यदि वे अपने हिस्से का 40 प्रतिशत धन नहीं जुटा पाते, तो उन्हें काम में कटौती करनी होगी या परियोजनाओं को बंद करना होगा। अब राज्यों की आमदनी में यह धन आये, इस बारे में मोदी सरकार की चुप्पी अजीब है। इसके अलावा, जी राम जी अधिनियम बुवाई और कटाई के सीजन के दौरान 60 दिनों के अनिवार्य अवकाश का प्रावधान करता है।

सरकार का मानना है कि इस दौरान कृषि क्षेत्र में पर्याप्त काम उपलब्ध होता है, लेकिन यह धारणा संदिग्ध है। आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2023 तक 6.3 करोड़ परिवारों ने काम की मांग की थी, लेकिन केवल 5.6 करोड़ को ही काम मिला। निश्चित रूप से मनरेगा के कार्यान्वयन में खामियां थीं और औसत रोजगार 100 दिनों के बजाय 50 दिनों के नीचे रहा था, लेकिन वह एक कानूनी अधिकार था। नया अधिनियम स्पष्ट रूप से काम के अधिकार के सिद्धांत से बचने और केंद्र के वित्तीय बोझ को राज्यों पर डालने के लिए बनाया गया है।