प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना का यहां बुरा हाल है
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी आवास योजना वर्तमान में ठंडे बस्ते में जाती दिख रही है। जम्मू-कश्मीर हाउसिंग बोर्ड द्वारा पूरे प्रदेश में नई हाउसिंग कॉलोनियां विकसित करने का जो खाका तैयार किया गया था, वह केवल कागजों तक ही सीमित रह गया है। मुख्य रूप से पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर आधारित यह योजना किसी भी निजी डेवलपर को आकर्षित करने में विफल रही है।
2024 के मध्य में बोर्ड ने निजी डेवलपर्स से रुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित की थी। विधानसभा चुनावों की आचार संहिता के कारण यह प्रक्रिया रुकी और फिर अक्टूबर 2024 तक इसकी समय सीमा बढ़ाई गई। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि समय सीमा समाप्त होने के बाद भी एक भी ठोस प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुआ। इस विफलता का मुख्य कारण बोर्ड का वह निर्णय माना जा रहा है जिसमें वित्त पोषण, मंजूरी, निर्माण और रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी निजी क्षेत्र पर डाल दी गई थी, जबकि बोर्ड का काम केवल जमीन उपलब्ध कराना था।
इस देरी ने मध्यम आय वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को गहरा निराश किया है। हाउसिंग बोर्ड ने कई जिलों में जमीन की पहचान भी कर ली है। उदाहरण के लिए, सांबा के बीरपुर में 45 कनाल, पुलवामा के पदगामपुरा में 30 कनाल, बांदीपोरा के वाटापोरा में 200 कनाल और जम्मू के भलवाल में 85 कनाल जमीन चिन्हित की गई है। इसके अलावा श्रीनगर, गांदरबल, कठुआ और पुंछ में भी सैकड़ों कनाल जमीन उपलब्ध है।
हाउसिंग बोर्ड के प्रबंध निदेशक शहबाज अहमद मिर्जा ने स्वीकार किया कि पीपीपी मोड अब तक कोई सकारात्मक परिणाम देने में विफल रहा है। मुख्यमंत्री ने बोर्ड को निर्देश दिया है कि वे आधुनिक प्रबंधन प्रथाओं को अपनाएं और तेजी से किफायती आवास प्रदान करें। हालांकि, बिना किसी संशोधित रोडमैप और निजी भागीदारी के, ये योजनाएं अनिश्चितता के घेरे में हैं। फिलहाल, सरकारी घोषणाएं फाइलों में कैद हैं और आम जनता को अभी भी अपने घर के सपने के सच होने का इंतजार है।