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बाहरी चुनौतियों से लड़ने की औकात नहीं बची भाजपा की

आंतरिक कलह से जूझती पार्टी को ऑक्सीजन कौन दे

  • नियमित कार्यक्रम, पर फीका उत्साह

  • मुंडा और दास की दूरी बनी चर्चा का विषय

  • सांगठनिक गतिरोध और भविष्य की चुनौती

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड की राजनीति में मुख्य विपक्षी दल के रूप में सक्रिय भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इन दिनों एक अजीबोगरीब सांगठनिक संकट से गुजर रही है। राज्य में पार्टी की गतिविधियां तो निरंतर चल रही हैं, लेकिन धरातल पर जो उत्साह और ऊर्जा दिखनी चाहिए, उसकी भारी कमी महसूस की जा रही है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि राज्य के दो सबसे कद्दावर चेहरों की रहस्यमयी चुप्पी और स्थानीय कार्यक्रमों से उनकी दूरी ने पार्टी को एक तरह से नेतृत्व के मोर्चे पर अनाथ जैसी स्थिति में खड़ा कर दिया है।

झारखंड भाजपा के वर्तमान सांगठनिक ढांचे में प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी, प्रदेश महामंत्री और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू जैसे नेता हर छोटे-बड़े कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। पार्टी नियमित रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है, हेमंत सोरेन सरकार की विफलताओं को उजागर कर रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनकल्याणकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार भी कर रही है। इसके बावजूद, आम कार्यकतार्ओं में वह जोश और जुझारूपन नहीं दिख रहा जो कभी भाजपा की पहचान हुआ करती थी।

पार्टी के भीतर सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और ओडिशा के वर्तमान राज्यपाल व पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को लेकर है। रघुवर दास के संवैधानिक पद पर होने के कारण उनकी प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी सीमित है, लेकिन उनके समर्थकों की निष्क्रियता पार्टी को खल रही है। वहीं, अर्जुन मुंडा की स्थानीय कार्यक्रमों से लगातार बढ़ती दूरी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। ये दोनों नेता झारखंड भाजपा के स्तंभ माने जाते रहे हैं और इनकी अनुपस्थिति से कार्यकतार्ओं के एक बड़े वर्ग में यह संदेश जा रहा है कि शीर्ष स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं है।

जानकारों का मानना है कि बाबूलाल मरांडी और आदित्य साहू जैसे नेता भले ही जमीन पर पसीना बहा रहे हैं, लेकिन अर्जुन मुंडा और रघुवर दास जैसे नेताओं के व्यापक जनाधार का विकल्प ढूंढना पार्टी के लिए फिलहाल मुश्किल साबित हो रहा है। जब तक ये दिग्गज नेता और उनके समर्थक एकजुट होकर मैदान में नहीं उतरते, तब तक सांगठनिक गतिविधियों में वह अपेक्षित गति नहीं आ पाएगी।

कार्यकतार्ओं में व्याप्त इस उत्साह की कमी का सीधा असर आगामी चुनावों और जन-आंदोलनों पर पड़ सकता है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रदेश नेतृत्व इन दिग्गजों को फिर से मुख्यधारा में जोड़ने में सफल होगा, या फिर आपसी खींचतान में भाजपा अपनी मजबूती खोती जाएगी? फिलहाल, राज्य की सत्ता में वापसी का सपना देख रही भाजपा के लिए यह नेतृत्व का खालीपन एक बड़ी चुनौती बन गया है।