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मोदी सरकार का सुशासन का दावा फिर से सवालों में

सीएजी ने धन की बर्बादी के लिए फटकार लगायी

  • जैव प्रौद्योगिकी और पर्यावरण निकायों की सुस्ती

  • परमाणु और अंतरिक्ष विभाग में भारी चूक

  • अन्य विभागों में वित्तीय लापरवाही

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने देश के प्रमुख वैज्ञानिक और पर्यावरण विभागों की कार्यप्रणाली पर एक बेहद तीखी ऑडिट रिपोर्ट पेश की है। 18 दिसंबर को जारी इस अनुपालन रिपोर्ट में अरबों रुपये के सार्वजनिक धन की बर्बादी, प्रशासनिक देरी और प्रणालीगत कुप्रबंधन का कच्चा चिट्ठा खोला गया है। कैग ने स्पष्ट किया है कि आंतरिक नियंत्रण और निगरानी की कमी के कारण कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक मिशन अपने उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहे हैं।

रिपोर्ट में परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत संचालित बोर्ड ऑफ रेडिएशन एंड आइसोटोप टेक्नोलॉजी की कड़ी आलोचना की गई है। ऑडिट के अनुसार, सितंबर 2024 तक यह संस्था अपने ग्राहकों से 152.47 करोड़ रुपये की बकाया राशि वसूलने में नाकाम रही। इसके अतिरिक्त, वैधानिक नियमों का पालन न करने के कारण संस्था पर सेवा कर, उत्पाद शुल्क और दंड के रूप में 62.04 करोड़ रुपये की भारी देनदारी बन गई है।

वहीं, अंतरिक्ष विभाग की ऑडिट में भी बड़ी खामियां पाई गईं। विभाग ने न केवल बिजली शुल्क के रूप में 1.06 करोड़ रुपये का अनावश्यक भुगतान किया, बल्कि दो महत्वपूर्ण संचार उपग्रहों का उनकी क्षमता के अनुरूप उपयोग भी नहीं किया गया। यह परिचालन दक्षता में एक बड़ी गिरावट को दर्शाता है।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग के नेशनल बायोफार्मा मिशन में क्षमता की भारी कमी देखी गई। स्वीकृत 51 पदों के विरुद्ध यह मिशन केवल 12 कर्मचारियों के सहारे चल रहा था, जिसके कारण परियोजनाओं के चयन में देरी हुई और वैश्विक प्रतिस्पर्धा सीमित रह गई। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत आने वाले जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की स्थिति और भी चिंताजनक है।

कैग ने पाया कि सर्वेक्षण और अनुसंधान के निष्कर्षों में 1 से 16 वर्ष की देरी हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले पाँच वर्षों में एकत्र किए गए 77 प्रतिशत पशु नमूनों की अब तक पहचान नहीं हो सकी है, क्योंकि आवश्यक पदों पर भर्ती ही नहीं की गई। भारतीय मौसम विभाग निजी हवाई अड्डा ऑपरेटरों से 7.28 करोड़ रुपये का मौसम संबंधी शुल्क वसूलने में विफल रहा।

दुर्गापुर स्थित सीएसआईआर सीएमईआरआई ने 2017 में 0.78 करोड़ रुपये का एक स्वायत्त पानी के नीचे चलने वाला वाहन खरीदा था, जो तब से अब तक अप्रयुक्त पड़ा है। वहीं, नेशनल फिजिकल लैबोरेट्री ने अनिवार्य रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम नहीं लगाया, जिससे उसे 1.14 करोड़ रुपये की छूट का नुकसान हुआ। कैग ने निष्कर्ष निकाला है कि ये चूकें प्रभावी निगरानी की कमी का परिणाम हैं और इन विभागों को जवाबदेही तय करने की सख्त जरूरत है ताकि जनता के निवेश का लाभ देश को मिल सके।