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अरावली पर सरकारी संकट किसके फायदे में

अरावली पर्वत श्रृंखला, जो दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रेणियों में से एक है, उत्तर भारत की पारिस्थितिक जीवन रेखा मानी जाती है। लगभग 700 किलोमीटर लंबी यह पर्वत श्रृंखला थार मरुस्थल की धूल और रेत को रोकने के लिए एक प्राकृतिक ढाल का कार्य करती है। इसके साथ ही, यह दिल्ली-एनसीआर सहित कई राज्यों के लिए भूजल पुनर्भरण का मुख्य स्रोत है और समृद्ध जैव विविधता को संजोए हुए है।

हालांकि, हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार की उस नई परिभाषा को स्वीकार किए जाने के बाद विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता व्यक्त की है, जिसमें कहा गया है कि केवल 100 मीटर से ऊँची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नियम पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण अरावली के एक बड़े हिस्से को कानूनी सुरक्षा से वंचित कर देगा, जिससे दिल्ली सहित कई क्षेत्र भीषण गर्मी, सूखे और धूल भरी आँधियों की चपेट में आ सकते हैं। यह अलग बात है कि मामले को लेकर आलोचना से भयभीत सरकार ने अपना पूर्व फैसला बदलने की बात कही है।

सतत संपदा क्लाइमेट फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक हरजीत सिंह ने इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि केवल 100 मीटर से ऊपर की पहाड़ियों को अरावली का दर्जा देना उत्तर भारत की साँसों और कुओं को सुखाने जैसा है। उन्होंने कहा, कागजों पर इसे सतत खनन और विकास का नाम दिया जा रहा है, लेकिन धरातल पर यह डायनामाइट, चौड़ी सड़कें और गहरे गड्ढे हैं, जो तेंदुओं के गलियारों, सामुदायिक भूमि और दिल्ली-एनसीआर की अंतिम हरित ढाल को नष्ट कर रहे हैं।

सिंह ने चेतावनी दी कि यह नई परिभाषा इस पर्वत श्रृंखला के क्रमिक विलोपन की तरह है। इससे न केवल वन्यजीव और जैव विविधता नष्ट होगी, बल्कि भूजल स्तर में भारी गिरावट आएगी और वायु प्रदूषण का स्तर जानलेवा सीमा तक पहुँच जाएगा। नई परिभाषा के अनुसार, अरावली पहाड़ी उसे माना जाएगा जिसकी ऊँचाई अपने स्थानीय धरातल से 100 मीटर या उससे अधिक हो। वहीं, अरावली पर्वतमाला ऐसी दो या दो से अधिक पहाड़ियों का समूह होगी जो एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में स्थित हों।

पर्यावरणविद् विमलेंदु झा ने इस ओर ध्यान दिलाया कि इस फैसले से अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा लुप्त होने की कगार पर पहुँच सकता है। उन्होंने कहा कि एक तरफ सर्वोच्च न्यायालय दीर्घकालिक पर्यावरण सुधार की बात करता है, तो दूसरी तरफ खनन और विकासात्मक गतिविधियों की अनुमति देना विरोधाभासी है। अरावली चंबल, साबरमती और लूणी जैसी महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम स्थल है। इसके जंगल और आर्द्रभूमि दुर्लभ पौधों और जीवों का घर हैं, जो अब असुरक्षित हो गए हैं।

अरावली में बढ़ते वनों की कटाई, अवैध खनन, पशु चराई और मानवीय अतिक्रमण ने मरुस्थलीकरण की समस्या को बढ़ा दिया है। इससे जलभृत क्षतिग्रस्त हो रहे हैं और झीलें सूख रही हैं। मार्च 2023 में सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए अरावली ग्रीन वॉल पहल शुरू की थी, जिसका लक्ष्य गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में 5 किलोमीटर चौड़ी ग्रीन बेल्ट बनाना है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉय चौधरी ने कहा कि धूल भरी आँधियों को रोकने में अरावली और उसकी हरित पट्टी की भूमिका निर्णायक है।

यह न केवल मरुस्थलीय धूल से हमें बचाती है, बल्कि वायुमंडल से जहरीले उत्सर्जन को सोखने का भी काम करती है। दिल्ली की वायु गुणवत्ता पहले से ही बेहद खराब श्रेणी में बनी हुई है, ऐसे में अरावली का विनाश राजधानी को रहने के अयोग्य बना सकता है। अरावली के संरक्षण का मुद्दा संसद में भी गूँज रहा है। कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार ने अरावली की पहाड़ियों के लिए डेथ वारंट पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।

उन्होंने वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 और वन संरक्षण नियम (2022) में किए गए संशोधनों को वापस लेने की मांग की है। वहीं, प्रियंका गांधी वाड्रा ने वायु प्रदूषण को एक गंभीर सार्वजनिक मुद्दा बताते हुए इस पर संसद में बहस की मांग की और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर कड़े सरकारी कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया। पर्यावरणविदों का स्पष्ट मत है कि शहर के भीतर लगाए जाने वाले पौधे अरावली जैसी विशाल प्राकृतिक प्रणाली का विकल्प नहीं हो सकते।

यदि इस पारिस्थितिक खजाने को नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को जल संकट और जहरीली हवा का सामना करना पड़ेगा। अब यह सवाल अनुत्तरित है कि आखिर अरावली के बारे में ऐसा गलत फैसला किसके फायदे के लिए लिया गया था। इसका उत्तर सरकार नहीं देगी, यह तय है फिर भी हम जांच पड़ताल से यह जान सकते हैं कि आखिर करोड़ों लोगों और वन्य जीवों की जान को दांव पर लगाने का यह काम किसके इशारे पर किया गया था।