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नाम बदलने के भाजपा के खेल पर अदालत ने लगाया ब्रेक रोक

राजस्थान के गांवों का नाम बदलने सुप्रीम रोक

  • निजी लोगों के नाम पर नहीं होगा गांव

  • दो गांवों को लेकर दायर थी याचिका

  • गांव के लोगों ने ही इसका विरोध किया

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और नीतिगत स्पष्टता वाले फैसले में यह व्यवस्था दी है कि कोई भी राज्य सरकार अपनी ही घोषित और बाध्यकारी नीतियों के विरुद्ध जाकर कार्य नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की खंडपीठ ने राजस्थान सरकार द्वारा निजी व्यक्तियों के नाम पर नए राजस्व गांवों का नामकरण करने के कदम को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसने बाड़मेर जिले में अमरगढ़ और सागतसर नामक गांवों के गठन की अनुमति दी थी।

विवाद की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क इस कानूनी विवाद की जड़ें 31 दिसंबर, 2020 को राजस्थान सरकार द्वारा जारी की गई एक अधिसूचना में हैं। राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 की धारा 16 के तहत जारी इस अधिसूचना के माध्यम से बाड़मेर जिले के सोहदा गांव के मेघवालों की ढाणी क्षेत्र को काटकर दो नए राजस्व गांव—अमरगढ़ और सागतसर बनाने की घोषणा की गई थी। सोहदा गांव के निवासियों ने इस नामकरण का पुरजोर विरोध किया। उनका तर्क था कि ये नाम स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों, अमराराम और सागत सिंह के नाम पर रखे गए हैं, जिन्होंने कथित तौर पर गांव के लिए भूमि दान की थी।

हाईकोर्ट के परस्पर विरोधी निर्णय मामला जब उच्च न्यायालय पहुँचा, तो एकल न्यायाधीश ने 11 जुलाई, 2025 को अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह नामकरण राजस्थान सरकार के ही 20 अगस्त, 2009 के उस परिपत्र (सर्कुलर) का स्पष्ट उल्लंघन है, जो किसी भी राजस्व गांव का नाम किसी व्यक्ति, धर्म, जाति या उप-जाति के नाम पर रखने पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाता है। हालांकि, बाद में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इस आधार पर आदेश पलट दिया कि गांव गठन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, इसलिए अब हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खंडपीठ के तर्क को त्रुटिपूर्ण माना। न्यायालय ने कहा कि 2009 की नीति का उद्देश्य समाज में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखना और किसी भी प्रकार के व्यक्ति-केंद्रित तुष्टिकरण को रोकना था। पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि सरकार द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय, भले ही वे कार्यकारी प्रकृति के हों, राज्य पर तब तक बाध्यकारी होते हैं जब तक उन्हें कानूनी रूप से वापस न लिया जाए या संशोधित न किया जाए।

न्यायालय ने आगे कहा कि अपनी ही नीति के विपरीत कार्य करना मनमाना है और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। केवल इसलिए कि किसी व्यक्ति ने भूमि दान की है, सार्वजनिक संपत्ति या गांव का नाम उसके नाम पर रखना कानून की नजर में सही नहीं ठहराया जा सकता। अंततः, शीर्ष अदालत ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल करते हुए उक्त अधिसूचना को रद्द कर दिया और सरकार को कानून के अनुसार नए सिरे से नामकरण करने की स्वतंत्रता दी।