आर्टिफिशियल इंटैलिजेंस तकनीक पर लगाम
पेरिसः 21 दिसंबर 2025 को वैश्विक तकनीकी परिदृश्य में एक नए युग की शुरुआत हुई है। यूरोपीय संघ ने अपने बहुप्रतीक्षित ए आई एक्ट को पूरी तरह से प्रभावी कर दिया है। यह दुनिया का पहला ऐसा कानून है जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विनियमित करने के लिए एक सख्त और स्पष्ट कानूनी आधार प्रदान करता है।
यह कानून केवल यूरोपीय कंपनियों पर ही नहीं, बल्कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई जैसी हर उस वैश्विक कंपनी पर लागू होगा जो यूरोप के बाजार में अपनी सेवाएँ देना चाहती हैं। इस कानून की सबसे बड़ी विशेषता इसका जोखिम-आधारित दृष्टिकोण है। यूरोपीय संघ ने ए आई प्रणालियों को उनके द्वारा समाज को पहुँचाए जाने वाले खतरे के आधार पर चार श्रेणियों में विभाजित किया है:
ऐसी प्रणालियाँ जो लोगों की सुरक्षा या मौलिक अधिकारों के लिए खतरा हैं, उन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसमें सार्वजनिक स्थानों पर रीयल-टाइम फेशियल रिकग्निशन (चेहरे की पहचान) और सरकारों द्वारा की जाने वाली सोशल स्कोरिंग शामिल है। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कानून प्रवर्तन में उपयोग होने वाले ए आई को सख्त मानकों और मानवीय निगरानी से गुजरना होगा। चैटबॉट्स और गेमिंग जैसे क्षेत्रों में पारदर्शिता के सामान्य नियम लागू होंगे।
अब तकनीकी कंपनियों के लिए सीक्रेसी का दौर खत्म हो गया है। नए नियमों के अनुसार, कंपनियों को अब सार्वजनिक रूप से यह खुलासा करना होगा कि उन्होंने अपने जटिल ए आई मॉडल (जैसे चैटजीपीटी या जेमिनी) को प्रशिक्षित करने के लिए किस डेटा का उपयोग किया है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि वे कॉपीराइट कानूनों का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। इसके अलावा, ए आई द्वारा तैयार की गई सामग्री डीपफेक या टेक्स को स्पष्ट रूप से ए आई जनित के रूप में लेबल करना अनिवार्य होगा।
नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों के लिए सज़ा का प्रावधान बेहद कड़ा है। उल्लंघन करने वाली कंपनी पर उसके कुल वैश्विक टर्नओवर का 7 प्रतिशत तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। यह कदम न केवल यूरोप के नागरिकों की निजता सुनिश्चित करता है, बल्कि यह दुनिया भर के अन्य देशों के लिए एक ब्लूप्रिंट के रूप में भी कार्य कर रहा है। यूरोपीय संघ का संदेश स्पष्ट है: तकनीक का विकास लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय गरिमा की कीमत पर नहीं हो सकता।