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मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाए जाने का विरोध जारी

कांग्रेस और माकपा का देशव्यापी विरोध

  • आगे भी इसके खिलाफ आंदोलन होगा

  • राज्यों पर अपना बोझ डाल रही मोदी सरकार

  • नाम हटाना स्वशासन की भावना के खिलाफ

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः शुक्रवार को तिरुपति सहित देश के विभिन्न हिस्सों में कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के उस फैसले के खिलाफ कड़ा विरोध प्रदर्शन किया, जिसके तहत मनरेगा (मनरेगा) योजना से महात्मा गांधी का नाम हटा दिया गया है।

तिरुपति शहर कांग्रेस के अध्यक्ष गौडापेरू चित्तीबाबू ने केंद्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, कांग्रेस द्वारा लाई गई यह योजना ग्रामीण गरीबों को काम और आय प्रदान करने के लिए थी। महात्मा गांधी का नाम हटाकर सरकार ने इस नेक इरादे वाली योजना को छोटा करने का प्रयास किया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि गांधी जी स्थानीय स्वशासन के प्रतीक रहे हैं, और उनके नाम को हटाना स्वशासन की भावना पर प्रहार है।

वहीं, माकपा की जिला समिति ने न केवल नाम बदलने बल्कि योजना के ढांचे में किए गए बदलावों के खिलाफ भी मोर्चा खोला। पार्टी का आरोप है कि नए बदलावों के कारण राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा और ग्रामीण रोजगार की बुनियादी संरचना प्रभावित होगी।

इससे पहले गुरुवार रात को विपक्षी नेताओं ने संसद परिसर में 12 घंटे का ऐतिहासिक धरना दिया। यह विरोध विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी जी राम जी विधेयक के पारित होने के खिलाफ था। यह नया कानून 20 साल पुराने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) का स्थान लेगा।

माकपा सांसद सुष्मिता घोष ने इस विधेयक को गरीब-विरोधी, जन-विरोधी और किसान-विरोधी करार देते हुए कहा कि यह देश के गरीबों और महात्मा गांधी का अपमान है। उन्होंने सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण बिल को चर्चा के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया और न ही इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा गया। विपक्ष का कहना है कि यह लोकतंत्र की हत्या है।

दूसरी ओर, संसद में शोर-शराबे के बीच विधेयक पारित होने के दौरान केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने जोर देकर कहा कि पुरानी योजना की कमियों को दूर करने और उसे अधिक प्रभावी बनाने के लिए यह बदलाव आवश्यक था। नए कानून के तहत अब हर साल 125 दिनों के ग्रामीण मजदूरी रोजगार की गारंटी दी गई है। हालांकि, विपक्ष ने इसे काला कानून बताते हुए देशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।