पैसा वापस चाहिए तो हमारा वोट भी वापस करो
राष्ट्रीय खबर
पटना: बिहार के दरभंगा जिले के जाले ब्लॉक से एक बेहद दिलचस्प और पेचीदा मामला सामने आया है। यहाँ राज्य सरकार ने उन 14 पुरुष लाभार्थियों को कानूनी नोटिस जारी कर 10,000 रुपये वापस करने को कहा है, जिनके खातों में तकनीकी खराबी की वजह से सरकारी राशि पहुँच गई थी। हालांकि, इन ग्रामीणों ने पैसे लौटाने से साफ इनकार करते हुए सरकार के सामने एक ऐसी शर्त रख दी है जिसने प्रशासन को सोच में डाल दिया है।
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले, 25 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत 1.4 करोड़ महिलाओं को अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए 10,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खातों में भेजी गई थी। जानकारों का मानना है कि इस योजना ने चुनावों में गेम चेंजर की भूमिका निभाई और एनडीए गठबंधन की भारी जीत में महिलाओं के वोटों का बड़ा योगदान रहा।
जाले ब्लॉक के कुछ गांवों में तकनीकी त्रुटि के कारण यह पैसा महिलाओं के बजाय पुरुषों के खातों में चला गया। अब, चुनाव परिणाम आने और एनडीए सरकार बनने के करीब एक महीने बाद, प्रशासन इन पुरुषों से पैसे की वसूली की कोशिश कर रहा है। लेकिन लाभार्थी सरकार के इस कदम से बेहद नाराज हैं।
इस मामले में नोटिस पाने वाले एक दिव्यांग लाभार्थी बलराम सहनी ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि वह एक गरीब मजदूर हैं और उन्होंने यह पैसा घर की जरूरतों और कपड़ों पर खर्च कर दिया है। उनके साथी ग्रामीण नरेंद्र राम ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया, अगर यह तकनीकी गलती थी, तो 26 सितंबर को पैसे आने के तुरंत बाद हमें क्यों नहीं बताया गया? अब जब हमारे वोट से चुनाव जीत लिया गया है, तब तीन महीने बाद वसूली का नोटिस क्यों आ रहा है?
ग्रामीणों का स्टैंड बहुत स्पष्ट और कड़ा है। वे कहते हैं, सरकार ने हमें पैसे दिए और हमने उन्हें वोट दिया। अब हिसाब बराबर हो चुका है। अगर सरकार को अपने पैसे वापस चाहिए, तो वह हमारा दिया हुआ वोट हमें वापस कर दे, हम उनके 10,000 रुपये लौटा देंगे। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि सरकार जानबूझकर गरीब मजदूरों को परेशान कर रही है।
इस अजीबोगरीब विरोध ने स्थानीय प्रशासन को मुश्किल में डाल दिया है। तकनीकी खराबी और चुनावी समय में पैसे भेजने की इस चूक ने अब एक राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ दी है, जहाँ गरीब लाभार्थी इसे अपना अधिकार मान रहे हैं और प्रशासन इसे सरकारी धन की रिकवरी का मामला बता रहा है।