अजीब विडम्बना है! जिस भारतीय प्रशासनिक सेवा को कभी देश की स्टील फ्रेम कहा जाता था, आज उस फ्रेम में जंग लगने की नहीं, बल्कि सीईसी पॉलिश लगने की चिंता है। हाल ही में, वोटर लिस्ट सुधार प्रक्रिया को लेकर हुए राजनीतिक घमासान और उस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कथित आचरण ने, नौकरशाही की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है।
हमारे प्यारे आदर्श बाबू अब एक अजीब संकट से जूझ रहे हैं। उनका ट्रेनिंग मैनुअल कहता है: निष्पक्षता, तटस्थता और कानून का पालन। लेकिन जब सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति कथित तौर पर एक पक्षपातपूर्ण मुस्कान के साथ सामने आता है, तो आदर्श बाबू के सामने दो सड़कें खुल जाती हैं। पहली सड़क है कि पुराने मैनुअल का पालन करें, निष्पक्षता दिखाएँ, और फिर प्रमोशन लिस्ट में अपने नाम को लम्बित होते देखें, या किसी धूल भरी साइड पोस्टिंग पर अपनी ईमानदारी की माला जपें।
दूसरी सड़क सत्तारूढ़ दल की आकांक्षाओं को नियमों की रचनात्मक व्याख्या के रूप में समझें। अगर तृणमूल सांसद सीआसी पर हाथ खून से सने होने का आरोप लगाते हैं और सीईसी केवल आश्चर्य व्यक्त करते हैं, तो आदर्श बाबू को स्पष्ट संकेत मिलता है कि अब निष्पक्षता का अर्थ है, पक्ष के अनुसार निष्पक्षता।
इस माहौल में, अधिकारियों का मनोबल बुरी तरह टूटा है। अब उन्हें यह नहीं समझ आता कि वह जनता के प्रति जवाबदेह हैं या अधिकारी वर्ग के प्रति। उनकी ईमानदारी अब उनकी सबसे बड़ी अयोग्यता बन गई है। संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी कर रहे युवा, उत्साही उम्मीदवार अब भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए अकैडमी में नया पाठ्यक्रम पढ़ रहे हैं।
ट्रेनिंग में उन्हें सिखाया जाता था कि विवेक ही उनका अंतिम मार्गदर्शक है। लेकिन अब वे देखते हैं कि जहाँ विवेक का इस्तेमाल होता है, वहाँ ट्रांसफर होता है। उन्हें सीखना पड़ेगा कि अपनी राय को सुविधाजनक रूप से स्थगित कैसे किया जाता है। भविष्य के अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपने अंदर की आवाज़ और ऊपर की आवाज़ के बीच अंतर करना बंद कर दें।
इसी बात पर एक पुरानी फिल्म का गीत याद आ रहा है। वर्ष 1979 में बनी थी फिल्म दादा। इस फिल्म के गीत को कुलवंत जलिली ने लिखा था। इसे येसुदास और उषा खन्ना ने स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा कर चल दिये
दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा कर चल दिये
जाते जाते ये तो बता जा हम जियेंगे किस के लिये
चाँद भी होगा, तारे भी होंगे चाँद भी होगा, तारे भी होंगे
फूल भी होंगे, खुशबू भी होगी पर वो बात न होगी
जो तू न होगी पर वो बात न होगी
जो तू न होगी
दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा कर चल दिये
जाते जाते ये तो बता जा हम जियेंगे किस के लिये
कितने दिल तोड़े हैं जाने तू ने
कितने दिल तोड़े हैं जाने तू ने
कितने घर छोड़े हैं जाने तू ने
हम न पागल थे, पर पागल बन गये
हम न पागल थे,
पर पागल बन गये
दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा कर चल दिये
जाते जाते ये तो बता जा हम जियेंगे किस के लिये
तेरी यादें तेरी भूली हुई बातें
तेरी यादें तेरी भूली हुई बातें
तुझ को ढूंढ़ेंगी ये ग़म की रातें
बस एक तू न होगी बस एक तू न होगा
बस एक तू न होगी बस एक तू न होगा
दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा कर चल दिये
जाते जाते ये तो बता जा हम जियेंगे किस के लिये
हम जियेंगे किस के लिये हम जियेंगे किस के लिये
यह स्थिति हमें हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि जब एक संवैधानिक पद की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं रहता, बल्कि यह उस पूरी प्रशासनिक मशीनरी को खोखला कर देता है जो देश को चलाती है। आदर्श बाबू अब सिर्फ कागज़ों पर निष्पक्ष होंगे, क्योंकि असल जीवन में उन्हें पता है कि ईमानदारी का टैग उनकी जेब में रखे इस्तीफ़े के कागज़ से ज़्यादा कुछ नहीं है।
अफ़सोस! अब आईएएस का मतलब इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस कम, और इनविजिबल असिस्टेंस सर्विस ज़्यादा हो गया है। जाहिर है कि जो रिकार्ड अपने ज्ञानेश कुमार स्थापित कर रहे हैं, उससे आने वाले तमाम आदर्श बाबूओं को भविष्य में दूसरे किस्म की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और धीरे धीरे भारतीय प्रशासनिक सेवा अपना औचित्य ही खो देगी। वैसे भी सरकारी नौकरी में रहते हुए माल बटोरना कोई नई बात नहीं है पर माल बटोरने के लिए ऐसा हाल बना लेगा, चिंता का विषय है। अगर कहीं सरकार बदली तो ज्ञानेश कुमार का क्या हाल होगा, यह सोचा जा सकता है।