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चीन के वर्चस्व को चुनौती देने की तैयारी में जुटा भारत

7280 करोड़ की रेयर अर्थ मैग्नेट उत्पादन योजना

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः इलेक्ट्रिक वाहनों, स्मार्टफोन, लैपटॉप, चिकित्सा इमेजिंग मशीनों और यहाँ तक कि उन्नत लड़ाकू विमानों सहित हर आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक और उच्च-प्रदर्शन उपकरण के लिए रेयर अर्थ मैग्नेट्स (दुर्लभ मृदा चुंबक) अपरिहार्य हैं। ये अदृश्य घटक 21वीं सदी के तकनीकी विकास का आधार हैं। भारत, जो अगले दो दशकों में एक विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है, अब अपनी तकनीकी प्रगति को सुदृढ़ करने के लिए एक बड़ा कदम उठा रहा है। केंद्र सरकार ने रेयर अर्थ मैग्नेट्स के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 7,280 करोड़ रुपये की एक महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है।

वर्तमान में, चीन वैश्विक रेयर अर्थ मैग्नेट्स के बाजार पर लगभग 90 फीसद नियंत्रण रखता है, जिससे उसका वस्तुतः एकाधिकार है। बीजिंग अपनी भू-राजनीतिक रणनीति में इस शक्ति का उपयोग करता रहा है। इस योजना की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब चीन ने हाल ही में रेयर अर्थ मैग्नेट्स के निर्यात पर कड़े नियम लागू किए हैं, जिससे भारत सहित पूरी दुनिया के लिए इसकी आपूर्ति में चुनौतियां बढ़ गई हैं। फिलहाल, भारत अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए आयात पर पूरी तरह निर्भर है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स की पूरी घरेलू विनिर्माण व्यवस्था स्थापित करना है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित यह योजना भारत को एनडीपीआर (नियोडिमियम-प्रासियोडिमियम) ऑक्साइड को सीधे उच्च-प्रदर्शन वाले सिंटर्ड मैग्नेट्स में बदलने की एक एकीकृत घरेलू सप्लाई चेन बनाने में सक्षम बनाएगी। ये शक्तिशाली मैग्नेट इलेक्ट्रिक गाड़ियों, पवन चक्कियों और रक्षा प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक हैं। इस पहल का लक्ष्य हर साल लगभग 6,000 मीट्रिक टन की उत्पादन क्षमता स्थापित करना है।

यह योजना अगले 7 से 10 वर्षों में लागू होगी और इसमें पूंजी सब्सिडी, वायबिलिटी गैप फंडिंग और उत्पादन-लिंक्ड इंसेंटिव जैसे आर्थिक समर्थन शामिल होंगे। इसका लक्ष्य रेयर अर्थ ऑक्साइड से लेकर धातु, मिश्रधातु और तैयार मैग्नेट तक की पूरी मूल्य श्रृंखला को देश में ही विकसित करना है।

ये मैग्नेट दुनिया के सबसे मजबूत व्यावसायिक चुंबकों में से हैं। उदाहरण के लिए, एक सामान्य इलेक्ट्रिक कार को 1-2 किलो एनडीएफईबी मैग्नेट की आवश्यकता होती है, जबकि 3 मेगावॉट की पवन चक्की के लिए लगभग 600 किलो मैग्नेट जरूरी होते हैं। भारत 2030 तक 30 फीसद इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाने का लक्ष्य बना रहा है, जिससे इन मैग्नेट्स की मांग कई गुना बढ़ जाएगी।

भारत के पास विश्व के सबसे बड़े रेयर अर्थ मिनरल्स भंडारों में से एक मौजूद है, जिसके पास लगभग 6.9 मिलियन टन रेयर अर्थ ऑक्साइड समतुल्य संसाधन हैं। हालांकि, वैश्विक उत्पादन में भारत का हिस्सा वर्तमान में सिर्फ 1 फीसद के आसपास है। सबसे समृद्ध भंडार दक्षिण भारत में हैं, खासकर केरल में कोल्लम, अलाप्पुझा और कन्याकुमारी के बीच की मोनाजाइट बेल्ट। मोनाजाइट एक फॉस्फेट खनिज है जो सीरियम, लैंथनम, नियोडिमियम और थोरियम से भरपूर होता है, और यह तटीय रेत में पाया जाता है। इसके अलावा, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्र भी प्रमुख स्रोत हैं।

रेयर अर्थ तत्वों को निकालना मुश्किल है क्योंकि मोनाजाइट खनिज में थोरियम और यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी घटक होते हैं। इसलिए, इसका खनन और प्रसंस्करण परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड की कड़ी निगरानी में होता है। इन 17 तत्वों को अलग करना एक जटिल रासायनिक प्रक्रिया है, जिसमें सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन के सैकड़ों चरण शामिल होते हैं। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में एसिड की खपत होती है और यह विषाक्त एवं रेडियोधर्मी कचरा (1 टन ऑक्साइड के लिए 70-100 टन तक) पैदा करती है। इस संवेदनशीलता के कारण इस पूरे कार्यक्रम की देखरेख परमाणु ऊर्जा विभाग, खान मंत्रालय और नीति आयोग मिलकर कर रहे हैं। नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत के अनुसार, यह योजना भारत को दूसरों पर निर्भरता से मुक्त करके अपनी तकनीकी गति और शर्तों पर एक मजबूत ढांचा खड़ा करने में मदद करेगी।