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आइए ना हमरा बिहार में, मंत्री बना देंगे बिना खड़े हुए चुनाव में

कलियुगी धृतराष्ट्र की बिहार में भरमार, पुत्र प्रेम जायज़ बाकी सब ताक पर

हैरतंगेज है, निर्दलीय प्रत्याशी के काउंटिंग एजेंट से मंत्री पद तक का सफ़र! हाल में मंत्री बने उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश शुरुआत से हीं विवादों में घिर कर चर्चित हो चुके हैं। बीते दिन उन्होंने मंत्री की कुर्सी पर काबिज़ होते हीं पत्रकारों को अपना औकात दिखा दिया। चर्चा है कि पिछले सप्ताह तक वे अपनी अपनी सौतेली मां के विरुद्ध में चुनाव लड़ रहे एक निर्दलीय प्रत्याशी का काउंटिंग एजेंट थे। फिलहाल, उन्हें बिना किसी सदन का मेंबर बनाए पैराशूट से लॉन्च कर दिया गया। यह बिहार है, यहां कुछ भी असंभव नहीं!


कागज़ की इस लिबास को बदन से उतार दो, पानी बरस गया तो किसे मुंह दिखाओगे। शायद अब यह बातें पुरानी हो गई। नया जमाना है, नई सोच है, नए लोग हैं, यहां लिबास कौन देखता है। अब तो राम नाम जपना और सबका माल अपना के राह पर लोग बेधड़क चलने लगे हैं। स्वयं की हो रही किरकिरी को नजअंदाज कर देने में हीं निज-लाभ है, यह हर हाल में सधना चाहिए।

रंजीत कु. तिवारी

पटनाः  बिहार की राजनीति एक बार फिर अपने अप्रत्याशित और अनोखे आकर्षण के कारण सुर्खियों में है। यह घटना दर्शाती है कि यहाँ राजनीतिक जुगाड़ के दम पर बिना चुनाव लड़े भी सत्ता के शीर्ष पर पहुँचना संभव है। हाल ही में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) के प्रमुख जीतन राम मांझी के बेटों को मंत्री बनाया गया है, जिसने पुत्र प्रेम और परिवारवाद पर बहस छेड़ दी है।

जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन, जो पहले से ही विधान परिषद के सदस्य हैं, ने मंत्री पद की शपथ ली। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश ने भी मंत्री पद की शपथ ली है, जबकि वह अभी तक किसी भी सदन (विधानसभा या विधान परिषद) के सदस्य नहीं हैं। यह प्रावधान विशेषज्ञों और गैर-चुनावी हस्तियों को शामिल करने का अवसर देता है, लेकिन अक्सर इसका उपयोग शक्तिशाली नेताओं द्वारा अपने स्वजनों को सीधी सत्ता सौंपने के लिए किया जाता है।

उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे को मंत्री बनाए जाने पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने इस निर्णय को परिवारवाद के आरोप के बावजूद अपनी विवशता बताया है। कुशवाहा ने तर्क दिया है कि यह कदम उनकी पार्टी के अस्तित्व व भविष्य को बचाने व बनाए रखने के लिए न केवल ज़रूरी, बल्कि अपरिहार्य था। उन्होंने पिछली घटनाओं का हवाला दिया, जब पार्टी के विलय जैसे आत्मघाती निर्णय लेने पड़े थे और जीतने के बाद नेताओं के निकल जाने से पार्टी शून्य पर पहुँच गई थी।

उन्होंने कहा कि भविष्य में फिर से ऐसी स्थिति न आए, इसलिए उन्हें यह कदम उठाना पड़ा। कुशवाहा ने इस फैसले को ज़हर पीने के बराबर बताया क्योंकि वह जानते थे कि उन पर परिवारवाद का आरोप लगेगा, लेकिन उन्होंने खुद के कदम से फिर से शून्य तक पहुँचने के विकल्प को खोलना उचित नहीं समझा।

यह घटना चलो, आओ और सीधे मलाई खाओ की संस्कृति को रेखांकित करती है, जो चुनावी प्रक्रिया की कठिनता को दरकिनार कर देती है। संक्षेप में, यह घटनाक्रम बिहार की राजनीति की उस द्वैतता को प्रस्तुत करता है, जहाँ एक तरफ जनता का जनादेश है, और दूसरी तरफ़ पर्दे के पीछे होने वाले राजनीतिक सौदे। यह बताता है कि बिहार में राजनीति के खेल के नियम अक्सर लचीले और आश्चर्यों से भरे होते हैं।