मोहम्मद युनूस की सरकार खुद ही बहुत कमजोर जमीन पर
राष्ट्रीय खबर
ढाकाः बांग्लादेश की एक विशेष अदालत ने हाल ही में देश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराध के मामले में मौत की सज़ा सुनाई है। यह फैसला पिछले वर्ष हुए व्यापक छात्र विरोध प्रदर्शनों के दौरान किए गए कथित अपराधों से जुड़ा है। हसीना, जो वर्तमान में निर्वासन में हैं, पर विरोध प्रदर्शनों को बलपूर्वक दबाने और मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। इस फैसले ने बांग्लादेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा उबाल ला दिया है, और देश भर में हिंसा और विरोध प्रदर्शनों की खबरें आ रही हैं।
फैसला सुनाए जाने के बाद, हसीना की पार्टी, अवामी लीग, ने इस निर्णय को राजनीतिक रूप से प्रेरित और देश के कानूनी इतिहास का एक काला अध्याय बताया है। पार्टी के समर्थकों ने देशव्यापी बंद का आह्वान किया है, जिसके कारण जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है और कई स्थानों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुई हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दल, जो हसीना के लंबे शासन के दौरान दमन का आरोप लगाते रहे हैं, ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे न्याय की जीत बताया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, इस निर्णय पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस फैसले को पीड़ितों के लिए न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है, लेकिन साथ ही मौत की सज़ा दिए जाने पर खेद व्यक्त किया है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि शेख हसीना पर उनकी अनुपस्थिति में मुकदमा चलाया गया, जो निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकता है। यह घटना पड़ोसी भारत के लिए भी एक संवेदनशील मुद्दा बन गई है, क्योंकि भारत और बांग्लादेश के बीच मजबूत राजनयिक संबंध हैं। भारत को अब इस जटिल स्थिति में संतुलन साधते हुए अपनी प्रतिक्रिया देनी होगी।
यह पूरा घटनाक्रम बांग्लादेश की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और लोकतंत्र की चुनौतियों को उजागर करता है। आलोचकों का मानना है कि इस तरह के कड़े कानूनी फैसले देश के राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जबकि सरकार समर्थक इसे कानून के शासन की स्थापना के लिए आवश्यक कदम बता रहे हैं। बांग्लादेश अब एक गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट के मुहाने पर खड़ा है।