बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम कई संदेह पैदा करते हैं
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एसआईआर के समय से जारी विवाद
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अंत अंत में 21 लाख वोटर जुड़ गये
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बाद में तीन लाख और वोटर कहां से आये
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारत के चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए अत्यधिक अविश्वसनीय आंकड़ों के संबंध में एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। ये संदेह उस समय से शुरू हुए जब 23 जून की शाम को आयोग ने घोषणा की कि अगले दिन से बिहार में एसआईआर शुरू होगा। पिछले एसआईआर के बाद जनवरी 2025 में बिहार में 7.89 करोड़ मतदाता थे।
24 जून को एसआईआर शुरू होने के बाद, 1 अगस्त को जारी मसौदा सूची में मतदाताओं की संख्या घटकर 7.24 करोड़ रह गई, जिसका अर्थ है कि 65 लाख नाम हटा दिए गए थे। आयोग ने हटाने का कारण मृत्यु, स्थायी प्रवास, या डुप्लीकेट नामों को बताया था। 30 सितंबर को घोषित अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या फिर से बढ़कर 7.42 करोड़ हो गई। यह मात्र एक महीने के अंतराल में 21 लाख मतदाताओं का अज्ञात रूप से जुड़ना दर्शाता है, जिसके लिए पहले कोई उल्लेख नहीं किया गया था।
दरअसल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी के कई प्रेस कांफ्रेंस में जो मुद्दे उठाये गये हैं, उसने आम जनता को भी जागरूक कर दिया है। इसी वजह से कुल वोटर और हुए मतदान का अंतर भी लोग अपनी तरफ से न सिर्फ समझ पा रहे हैं बल्कि इस पर सवाल भी उठा रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि आयोग ने अंतिम सूची की घोषणा करने से पहले डुप्लीकेशन हटाने वाले सॉफ्टवेयर का उपयोग भी नहीं किया, जबकि यह सॉफ्टवेयर 2018 से उसके पास उपलब्ध है। अंतिम सूची के 7.42 करोड़ मतदाताओं के बाद, 11 नवंबर को (चुनाव समाप्त होने के बाद) ईसीआई की एक प्रेस विज्ञप्ति में पात्र मतदाताओं की संख्या 7.45 करोड़ बताई गई (ठीक 7,45,26,858)। सवाल यह है कि अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद आयोग को 3 लाख से अधिक मतदाता और कहाँ से मिले?
ये आंकड़े न केवल सांख्यिकीय विसंगति पैदा करते हैं, बल्कि चुनावी जनादेश की निष्पक्षता पर भी संदेह पैदा करते हैं। कुछ लोग इसे सत्तारूढ़ दल बीजेपी के इशारे पर चुनाव आयोग की चालाकी मानते हैं, खासकर जब नए प्रावधानों के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति 2:1 के बहुमत से हो रही है। वहीं, कुछ अन्य लोग मानते हैं कि यह शानदार जनादेश निवर्तमान एनडीए सरकार के प्रदर्शन या नीतीश कुमार के लगभग 20 वर्षों के सुशासन के रिकॉर्ड का परिणाम हो सकता है।
हालांकि, बिहार की वास्तविक स्थिति सुशासन के दावों से मेल नहीं खाती है। बिहार में देश की सबसे अधिक गरीबी दर है, बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से दोगुनी से अधिक है, और स्वास्थ्य एवं पोषण संकेतक बेहद खराब हैं। इस वजह से, यह जबरदस्त समर्थन वाला जनादेश संदिग्ध लगता है। यहाँ तक कि वह महिला वर्ग, जिसे कई विशेषज्ञ नीतीश कुमार का समर्थक मानते हैं, भी अंदरूनी तौर पर अलग कहानी बयां करता है। इसलिए, यह जनादेश आसानी से स्वीकार्य नहीं है।