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मतदाता सूचियों में नकली वोटरों का राष्ट्रीय विमर्श

भारतीय लोकतंत्र की नींव उसके चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर टिकी है। हालाँकि, हाल ही में महाराष्ट्र में मतदाता सूचियों की सत्यनिष्ठा को लेकर उठे गंभीर विवाद ने एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी शुचिता और प्रणाली में जनता के विश्वास के महत्व को केंद्र में ला दिया है।

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे द्वारा स्थानीय निकाय चुनावों से ठीक पहले मतदाता सूचियों में 96 लाख नकली मतदाताओं के शामिल होने का सनसनीखेज दावा न केवल राज्य की राजनीति में हलचल मचा रहा है, बल्कि यह पूरे देश में चुनावी सुधारों की आवश्यकता पर एक व्यापक विमर्श को जन्म दे रहा है।

राज ठाकरे ने इस कथित अनियमितता को महाराष्ट्र और देश के मतदाताओं का अपमान बताते हुए भारत निर्वाचन आयोग से मांग की है कि जब तक इस गंभीर मुद्दे का समाधान नहीं हो जाता, तब तक राज्य में चुनाव स्थगित रखे जाएं। यह मांग बताती है कि विपक्षी खेमे में यह धारणा कितनी गहरी हो गई है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की भारी कमी है, जो अंततः चुनावी परिणामों को विकृत कर सकती है।

इस दावे को तुरंत विपक्षी गठबंधन का समर्थन मिला। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने ठाकरे के 96 लाख फर्जी मतदाताओं के आंकड़े का समर्थन करते हुए इसे एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता बताया। राउत ने स्पष्ट किया कि विपक्षी दल चुनाव लड़ने से पीछे नहीं हट रहे हैं, बल्कि उनकी प्राथमिक मांग मतदाता सूची को ठीक किया जाना चाहिए है।

इस आरोप की गंभीरता को रेखांकित करते हुए, विपक्षी दलों ने 1 नवंबर को एक बड़ा विरोध मार्च निकालने की घोषणा की है। इतना ही नहीं, चुनावी अधिकारियों के साथ एक उच्च-स्तरीय बैठक की योजना भी बनाई गई है, जिसमें शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, और एनसीपी-एससीपी नेता शरद पवार जैसे दिग्गज नेता मतदाता सूची की विसंगतियों पर सीधे चर्चा करेंगे।

संजय राउत का सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर मैच-फिक्सिंग का आरोप लगाना और गहन जाँच की मांग करना, विपक्ष के बढ़ते अविश्वास को दर्शाता है। यह विवाद केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक राष्ट्रीय प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ चुनावी डेटा और प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी पहले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, नवंबर 2024 को लेकर धांधली के आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि चुनावों से पहले के पाँच महीनों में जोड़े गए नए मतदाताओं की संख्या पिछले पाँच वर्षों में जोड़े गए कुल मतदाताओं से अधिक थी। इस तरह के बार-बार और बड़े पैमाने पर लगाए गए आरोप, खासकर प्रमुख विपक्षी नेताओं द्वारा, यह संकेत देते हैं कि भारत की चुनावी प्रणाली के कुछ पहलुओं को लेकर राजनीतिक वर्ग के एक बड़े हिस्से में गहरी बेचैनी है।

चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता पर संदेह सीधे तौर पर लोकतंत्र में जनता के विश्वास को कमजोर करता है। यदि मतदाता सूची विश्वसनीय नहीं है, तो चुनावी परिणाम को भी संदिग्ध माना जाएगा, जिससे लोगों का लोकतांत्रिक संस्थाओं से मोहभंग हो सकता है। यदि लाखों फर्जी मतदाता मौजूद हैं, तो यह प्रत्येक वैध नागरिक के मत के मूल्य को कम करता है और वन पर्सन, वन वोट (एक व्यक्ति, एक वोट) के मूल लोकतांत्रिक सिद्धांत का उल्लंघन है। बार-बार उठने वाले ये सवाल यह दर्शाते हैं कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध करने की प्रक्रिया को और अधिक मजबूत, पारदर्शी और तकनीक-आधारित बनाने की आवश्यकता है।

आधार को मतदाता पहचान पत्र से जोड़ने जैसे कदमों के बावजूद, विसंगतियों का बने रहना प्रक्रियात्मक कमजोरियों की ओर इशारा करता है। सत्ताधारी पक्ष, महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हालांकि इन आरोपों को खारिज कर दिया है, और आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में अपने महायुति गठबंधन की भारी जीत का विश्वास व्यक्त किया है।

शिंदे ने कहा है कि उनका गठबंधन दिन रात काम करता है और वह पूरी तरह से तैयार है। यह प्रतिक्रिया दर्शाती है कि सत्तारूढ़ दल इन आरोपों को राजनीतिक हथकंडा मान रहा है और चुनावी तैयारी जारी रखे हुए है। निष्कर्ष रूप में, महाराष्ट्र में मतदाता सूची को लेकर उठा यह विवाद राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी शुचिता और लोकतंत्र में विश्वास के संकट को दर्शाता है।

राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, और शरद पवार जैसे प्रमुख नेताओं का एक साथ आकर विरोध करना और ईसीआई से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करना, इस मुद्दे की गंभीरता को अभूतपूर्व बना देता है। इस अहम मौके पर अब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को भी सामने आना चाहिए, जिनके बारे में परस्पर विरोधी सूचनाएं आयी हैं। सरकारी पक्ष के मुताबिक वह भारत में ही हैं जबकि विपक्ष के कई नेता यह कह चुके हैं कि वह विदेश भाग गये हैं।