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गठबंधन के प्रत्याशी अब प्रदीप बालमुचू के निशाने पर

अपने उम्मीदवारी की चाहत में पूरे कांग्रेस पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे

  • ज्ञानरंजन की कृपा से बने थे विधायक

  • लालू की निकटता से मंत्री भी बन गये

  • धीरज प्रसाद साहू ने राज्यसभा में भेजा

शिव कुमार अग्रवाल

रांची: झारखंड कांग्रेस पार्टी में अंदरूनी खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई है, और इसकी जड़ में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू का असंतुष्ट रवैया है। जिस कांग्रेस पार्टी ने उन्हें ज़मीन से उठाकर विधायक, संसद सदस्य और प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण पद दिए, आज वही व्यक्ति संगठन को सीधी चुनौती दे रहे हैं।

यह प्रवृत्ति पुरानी है: जब भी राज्य में चुनाव होते हैं, श्री बालमुचू को हर बार उम्मीदवारी चाहिए। अगर गठबंधन के तहत सीट का बँटवारा किसी अन्य सहयोगी दल के पक्ष में जाता है, तो वह कांग्रेस से बगावत कर देते हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि श्री बालमुचू स्वयं को पार्टी से ऊपर समझने लगे हैं। वह अपनी व्यक्तिगत राय को थोपने के लिए मनमाने तरीके से काम कर रहे हैं और कुछ चुनिंदा लोगों के शह पर, सुचारू रूप से चल रहे कांग्रेस संगठन को अपनी हरकतों से नुकसान पहुँचा रहे हैं।

जानकार बताते हैं कि लगभग दो दशक पहले, स्वर्गीय ज्ञान रंजन की कृपा और राजनीतिक संरक्षण से वह घाटशिला से विधायक बने थे। ज्ञान रंजन के निधन के बाद राजनीतिक परिदृश्य में अचानक बदलाव आया। लालू प्रसाद यादव के स्वर्गीय रंजन से मधुर संबंध थे, जिसका लाभ झारखंड के अलग राज्य बनने से पहले उन्हें बिहार की राजनीति में मिला और कुछ समय के लिए वह बिहार सरकार में राज्य मंत्री का पद संभालने में सफल रहे। अलग राज्य बनने के बाद, संगठन ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के महत्त्वपूर्ण पद पर बैठा दिया। इसी दौरान, तात्कालिक राजनीतिक समीकरणों के तहत उन्हें तत्कालीन राज्यसभा सदस्य धीरज प्रसाद साहू का सान्निध्य मिला, जिसकी बदौलत उन्हें भी मनोनीत राज्यसभा की सदस्यता प्राप्त हो गई।

जानकार बताते हैं कि कांग्रेस में इतनी आसानी से मान-सम्मान और पद मिल जाने के कारण उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ बेलगाम हो गईं। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में जब उन्हें टिकट नहीं मिला, तो इसके विरोध में वे आजसू पार्टी (AJSU) के साथ चले गए और विधानसभा चुनाव में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। बाद में, पूर्व राज्यसभा सांसद धीरज प्रसाद साहू की पैरवी के बल पर वह एक बार फिर कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए।

सूत्रों के अनुसार, पिछले लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने चाईबासा एवं खूंटी दोनों सीटों से अपनी मजबूत दावेदारी पेश की थी। हालाँकि, इंडिया गठबंधन ने ये दोनों सीटें जीत लीं। इतना ही नहीं, सूत्र बताते हैं कि पूर्व में पूर्वी सिंहभूम के एक उप-लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार बन्ना गुप्ता के खिलाफ भी उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से प्रचार किया था, जिससे पार्टी को नुकसान हुआ था।

वर्तमान में घाटशिला विधानसभा सीट झामुमो (JMM) के पाले में है, और गठबंधन के तहत कांग्रेस पार्टी ने झामुमो उम्मीदवार को समर्थन देने की घोषणा कर दी है। इसके बावजूद, श्री बालमुचू अभी भी पार्टी नेतृत्व के खिलाफ़ बैठकें आयोजित कर रहे हैं। वह इन हरकतों से क्या संदेश देना चाहते हैं, यह तो वही जानें। फ़िलहाल, श्री बालमुचू की इस ‘धमाचौकड़ी’ से अंततः कांग्रेस संगठन को ही नुकसान उठाना पड़ेगा, जबकि विपक्षी दल इसे भुनाने की फिराक में रहेंगे। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे इस आंतरिक असंतोष को जल्द से जल्द नियंत्रित करें।