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भारत जोड़ो यात्रा पर दो अलग अलग कार्यक्रम

  • मुख्य कार्यक्रम शहीद स्मारक से

  • दूसरा कार्यक्रम राजेंद्र चौक से प्रारंभ

  • गुटबाजी को खत्म करने की पहल नहीं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः भारत जोड़ो यात्रा के एक साल पूरे होने पर रांची में दो अलग अलग कार्यक्रम आयोजित हुए। पहला और मुख्य कार्यक्रम झारखंड के प्रभारी अविनाश पांडेय की अगुवाई में शहीद स्मारक से निकला। दूसरी तरफ वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष का विरोध कर पार्टी से निष्कासित नेताओं ने राजेंद्र चौक पर रैली आयोजित किया।

यूं तो दोनों कार्यक्रम राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के मौके पर थे लेकिन इससे साफ हो गया कि झारखंड में ही कांग्रेस दो खेमों में साफ तौर पर बंटी हुई है। अजीब स्थिति यह है कि इस दूरी को पाटने की दिशा में झारखंड के प्रभारी अविनाश पांडेय की तरफ से भी कोई पहल नहीं हुई है। नतीजा है कि कौन नेता किस गुट में है, यह हर कांग्रेसी को पता है पर प्रभारी को पार्टी को एकजुट करने की कोई चिंता नहीं है।

जानकारों की मानें तो विवाद की जड़ में प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर के साथ आलोक दुबे समूह का मतभेद है। वैसे मुख्य कार्यक्रम में कई अन्य कद्दावर नेताओँ की अनुपस्थिति अथवा उनके पीछे होने के भी राजनीतिक निहितार्थ निकाले गये। आम तौर पर पार्टी के कार्यक्रम में लगातार शामिल होने वाले अनेक नेताओं को शहीद चौक से अलबर्ट एक्का चौक तक जाते हुए भी पीछे की कतार में देखा गया।

दूसरी तरफ अविनाश पांडेय के साथ तस्वीर खींचाने की होड़ में भी धक्का मुक्की होती रही। इसपर कई पुराने कांग्रेसियों ने ही दबी जुबान में कहा कि जो लोग झारखंड प्रभारी के साथ अपनी फोटो लेने में जुटे हैं, उनमें से अधिकांश पार्टी के नियमित कार्यक्रमों में कभी नजर नहीं आते हैं। इसी धक्कामुक्की की स्थिति को देखते हुए ही अनेक बड़े नेता इस पैदल यात्रा में खुद ही पीछे चले गये।

आलोक दुबे और उनके समर्थकों की रैली में वे सारे लोग शामिल हुए, जो वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष ने नाराज चल रहे हैं। लोकसभा चुनाव करीब आने के दौर में भारत जोड़ने की कवायद में पार्टी खुद को जब नहीं जोड़ पा रही है तो लोग इसके लिए झारखंड प्रभारी को ही मूल रूप से जिम्मेदार मानते हैं।

प्रदेश अध्यक्ष का विरोधी गुट बार बार यह आरोप लगा रहा है कि जो खुद कभी पार्टी का विरोधी रहा है और आरपीएन सिंह की छत्रछाया में आगे बढ़ गया, उससे संगठन को मजबूत करने की कवायद की उम्मीद नहीं की जा सकती है। लोकसभा चुनाव के पहले संभावित उम्मीद की वजह से टिकट मांगने वालों की भीड़ बढ़ रही है लेकिन इनमें से कितने लोगो का कांग्रेस से पुराना जुड़ाव रहा है, यह अहम सवाल बन गया है।