लद्दाख की हिंसा केंद्र की विफलता है
केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में लंबे समय से चली आ रही संवैधानिक सुरक्षा और राजनीतिक स्वायत्तता की माँगों ने 24 सितंबर, 2025 को एक हिंसक मोड़ ले लिया, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में तनाव अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में चार लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए, जिससे शांत माने जाने वाले इस हिमालयी क्षेत्र की स्थिरता पर एक गहरा सवाल खड़ा हो गया है।
केंद्र सरकार की ओर से जारी बयानों में प्रदर्शनकारी नेताओं पर द्वेषपूर्ण कार्य करने का आरोप लगाया गया है, विशेषकर ऐसे समय में जब केंद्र उनकी लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा करने की दिशा में प्रयास कर रहा था। दूसरी ओर, आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रमुख नेताओं और संगठनों ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि आगजनी और हिंसा की यह घटनाएँ उनके नियंत्रण से बाहर के तत्वों द्वारा की गई थीं।
लद्दाख में जारी इस विशाल विरोध आंदोलन की मुख्य जड़ें चार प्रमुख माँगों में निहित हैं, जो क्षेत्र के निवासियों की पहचान, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की गहरी आकांक्षाओं को दर्शाती हैं। लद्दाख को एक केंद्र शासित प्रदेश के बजाय पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाए। संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना: इस प्रावधान के तहत आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता और भूमि, जंगल व संस्कृति की सुरक्षा मिलती है, जो लद्दाख की आदिवासी बहुल आबादी के लिए महत्वपूर्ण है।
स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों में आरक्षण: बाहरी लोगों की बढ़ती आमद को देखते हुए, स्थानीय युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों में पर्याप्त आरक्षण सुनिश्चित करना। अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व: क्षेत्र के लोगों के लिए लोकतांत्रिक और राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में अधिक प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे लद्दाख के दो प्रमुख नागरिक समाज गठबंधनों का संयुक्त समर्थन प्राप्त है। इनमें लेह एपेक्स बॉडी, जो बौद्ध बहुल लेह क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है, और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस, जो मुस्लिम बहुल कारगिल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है, शामिल हैं। भौगोलिक, धार्मिक और ऐतिहासिक रूप से कई मतभेद होने के बावजूद, ये दोनों समूह संवैधानिक सुरक्षा उपायों और अधिक राजनीतिक स्वायत्तता के अपने चार-सूत्रीय एजेंडे पर पूरी तरह से एकजुट हैं।
बुधवार, 24 सितंबर, 2025 को, यह विरोध प्रदर्शन तब हिंसक हो उठा जब लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद की युवा शाखा द्वारा बंद का आह्वान किया गया। लेह शहर में यह बंद जल्द ही एक बड़े टकराव में बदल गया। उपद्रवी भीड़ ने शहर में भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय को आग के हवाले कर दिया। इसके अतिरिक्त, लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद के मुख्यालय में भी तोड़फोड़ की गई, जो क्षेत्र के लोकतांत्रिक और प्रशासनिक ढांचे पर सीधा हमला था।
इस व्यापक हिंसा ने न केवल संपत्ति को नुकसान पहुँचाया, बल्कि प्रशासन और प्रदर्शनकारी समूहों के बीच भरोसे की खाई को भी गहरा कर दिया। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि केंद्र सरकार और इन प्रमुख संगठनों के बीच मई 2025 में एक समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य आंदोलन की प्रमुख चिंताओं को दूर करना था।
इन आश्वासनों के बावजूद, गतिरोध समाप्त नहीं हुआ। 23 सितंबर को, प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के साथ भूख हड़ताल पर बैठे दो बुजुर्ग प्रदर्शनकारियों के स्वास्थ्य बिगड़ने और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराए जाने की घटना से युवाओं के नेतृत्व में सार्वजनिक विरोध का एक नया और अधिक उग्र दौर शुरू हो गया। वर्तमान में, केंद्र सरकार का रुख काफी सख्त है।
केंद्र आरोप लगा रहा है कि सोनम वांगचुक जैसे नेता हिंसा भड़का रहे हैं, खासकर तब जब उनकी लगभग सभी माँगों का समाधान निकालने पर काम चल रहा है। यहाँ तक कि केंद्र ने विदेशी तत्वों की संलिप्तता की ओर भी संकेत दिया है, जो इस संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र के संदर्भ में एक गंभीर आरोप है।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारी गुटों का मानना है कि केंद्र ने अपने वादों को पूरी तरह लागू नहीं किया है, और उनका आंदोलन अहिंसक तथा संवैधानिक है। प्रदर्शनकारियों और केंद्र की धारणाओं में यह स्पष्ट अंतर मौजूदा मुद्दों और आगे की रणनीति, दोनों के संबंध में दिखाई देता है। लद्दाख देश के लिए एक अत्यंत संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्र है, जिसकी सीमाएँ चीन और पाकिस्तान दोनों से लगती हैं।
इसलिए, यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि सुरक्षा बल उपद्रवियों पर सख्ती से नियंत्रण करें, लेकिन साथ ही क्षेत्र के लोगों को विश्वास में भी लिया जाए। भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं से किसी भी तरह का समझौता किए बिना, लद्दाख के लोगों की जायज़ आकांक्षाओं को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरा करना ही स्थायी शांति और विकास की कुंजी है। दोनों पक्षों द्वारा संयम और रचनात्मक बातचीत की अपील की गई है, जो इस संकट को हल करने के लिए एकमात्र व्यवहार्य रास्ता है।