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डेढ़ करोड़ की धोखाधड़ी में पंद्रह साल बाद गिरफ्तारी

सीबीआई ने अभियुक्त के कोल्लम से धर दबोचा

राष्ट्रीय खबर

तिरुअनंतपुरमः पंजाब के लुधियाना में 1.5 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी के मामले में करीब 15 साल तक फरार रहने के बाद, सीबीआई ने आखिरकार केरल के कोल्लम से एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी सालों की कड़ी मेहनत और तकनीकी निगरानी का नतीजा है, जिसने इस लंबे समय से चल रहे मामले में एक अहम मोड़ ला दिया है।

यह मामला 21 जुलाई, 2010 को शुरू हुआ था, जब बैंक ऑफ इंडिया की लुधियाना शाखा में एक बड़ी धोखाधड़ी का खुलासा हुआ। जांच में सामने आया कि कोल्लम के कुलक्कड़ा, मावडी निवासी सुरेंद्रन जे. और उसके कुछ साथियों ने मिलकर बैंक को करोड़ों रुपये का चूना लगाया। इन लोगों ने जाली दस्तावेज़ों का इस्तेमाल करके बैंक से ₹1.5 करोड़ का विदेशी बिल खरीद क्रेडिट प्राप्त कर लिया था। यह एक सोची-समझी साजिश थी, जिसका मुख्य साजिशकर्ता सुरेंद्रन को माना गया।

जांच के दौरान, सीबीआई ने पाया कि सुरेंद्रन पुथूर, कोल्लम में स्थित स्टिच एंड शिप नामक एक साझेदारी फर्म का मालिक था। इस फर्म की आड़ में ही उसने यह धोखाधड़ी की थी। सीबीआई ने इस मामले की गहनता से जांच की और मोहाली, एसएएस नगर की विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसजेएम) अदालत में सुरेंद्रन और अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया।

हालाँकि, आरोप पत्र दायर होने के बाद सुरेंद्रन कानून की गिरफ्त से बच निकला और फरार हो गया। 2012 में जब मुकदमे की सुनवाई शुरू हुई, तो वह अदालत में पेश नहीं हुआ। इसके बाद, अदालत ने उसे भगोड़ा घोषित कर दिया।

सुरेंद्रन को पकड़ने के लिए सीबीआई ने कई वर्षों तक कोशिश की, लेकिन उसका पता नहीं चल सका। ऐसा लग रहा था कि वह पूरी तरह से गायब हो चुका है। परंतु, सीबीआई ने हार नहीं मानी। हाल ही में, तकनीकी निगरानी और जमीनी स्तर पर सत्यापन की मदद से जांच एजेंसी को सुरेंद्रन के कोल्लम में होने की जानकारी मिली। इसके बाद, सीबीआई की टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसे धर दबोचा।

सुरेंद्रन को गिरफ्तार करने के बाद 19 सितंबर, 2025 को तिरुवनंतपुरम के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उसे पंजाब ले जाने के लिए ट्रांजिट रिमांड पर भेज दिया। अगले दिन, 20 सितंबर, 2025 को उसे मोहाली की एसजेएम अदालत में पेश किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इस गिरफ्तारी से यह साफ होता है कि कानून की पहुंच से कोई भी अपराधी ज्यादा समय तक नहीं बच सकता। यह मामला दर्शाता है कि जांच एजेंसियाँ चाहे कितना भी समय लगे, अपने काम को पूरा करती हैं और न्याय सुनिश्चित करती हैं।