भारतीय विदेश नीति अब पिंग पोंग बॉल है
पहले ही बता दें कि टेबल टेनिस के खेल में जिस गेंद का इस्तेमाल होता है, उसे ही पिंग-पोंग बॉल कहते हैं। यह गेंद एक टेबल के दोनों तरफ उछलती रहती है क्योंकि दोनों छोर पर खड़े खिलाड़ी उसे एक दूसरे की तरफ धकेलते रहते हैं।
अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंधों में आई कड़वाहट, चीन और रूस के साथ अचानक बढ़ते संबंधों और इसके कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले गंभीर प्रभावों पर ध्यान दे तो ऐसा ही नजर आता है।
विदेश नीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते, लेकिन यह भी तर्क देते हैं कि मोदी सरकार की अप्रत्याशित नीतियाँ देश को आर्थिक संकट की ओर धकेल रही हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति को रेखांकित किया गया है। डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरती कीमत, निर्यात व्यापार का अस्त-व्यस्त होना, और शेयर बाज़ार में मची उथल-पुथल को उजागर किया गया है। सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी टैरिफ है।
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने से भारत का अमेरिका को होने वाला 87 अरब डॉलर का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
इससे कपड़ा, चमड़ा, रत्न, आभूषण और समुद्री भोजन जैसे प्रमुख उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। लेखक के अनुसार, इन टैरिफों से करोड़ों भारतीयों की आजीविका पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे पहले से ही 45 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँची बेरोजगारी और बढ़ेगी।
जानकार गुजरात और बंगाल के कपड़ा और चमड़ा उद्योगों का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि ये उद्योग बंद होने की कगार पर हैं। इस संकट को देखते हुए, वाणिज्य मंत्रालय 40 से अधिक देशों में नए बाज़ारों की तलाश कर रहा है, लेकिन जानकार इसे मृत्यु के समय हरिनाम जैसा बताते हैं।
जयशंकर की विदेश नीति में आए इस 180 डिग्री के बदलाव पर सवाल उठाते हुए विदेश नीति के विशेषज्ञ कहते हैं कि सरकार ने पहले से तत्परता क्यों नहीं दिखाई? डोनाल्ड ट्रंप के साथ संबंधों में आई खटास के बाद, मोदी सरकार ने रूस और चीन की ओर रुख किया है।
अनुभवी लोग इस बदलाव को एक राजनीतिक मजबूरी मानते हैं। एससीओ और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को अचानक मिली महत्ता पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए, स्वाभाविक सवाल उठते हैं कि क्या कम्युनिस्ट जिनपिंग वाकई दोस्त बन सकते हैं?
वे 1962 के भारत-चीन युद्ध का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि चीन पर भरोसा करना जोखिम भरा है। इसके बावजूद, सात साल की कड़वाहट, जिसमें डोकलाम और गलवान जैसी घटनाएँ शामिल हैं, के बाद भी दोनों देशों के नेता एक मेज पर बैठकर बात कर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन द्वारा पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति का भी ज़िक्र किया गया है, जो इस दोस्ती पर संदेह पैदा करता है।
जीएसटी प्रणाली में हुए बदलावों पर भी कटाक्ष करते हैं, जिनके बारे में सरकार का दावा है कि वे अमेरिकी टैरिफ से होने वाले नुकसान की भरपाई करेंगे। यह स्थिति उस कहावत की तरह है, जिसमें कहा जाता है, पेड़ पर कटहल और मूँछ पर तेल। ज़मीनी हकीकत यह है कि बाज़ार में खरीदारी कम हो गई है। अंत में, लेखक कहते हैं कि मोदी सरकार सपनों का जाल बुनने में माहिर है।
वे लगातार गोलपोस्ट हिलाकर लोगों का ध्यान भटकाते हैं। तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के सपने से लेकर दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के वादे तक, ये सभी बातें देश की आम जनता को गुमराह करने का एक तरीका लगती हैं। इसलिए यह कहा जाने लगा है कि मोदी युग में जनता भी एक पिंग-पोंग बॉल बन गई है।
जनता नोटबंदी, किसान कानूनों और जीएसटी के कारण हुए नुकसान को भूल चुकी है, और सरकार के नए-नए दावों पर विश्वास करती रहती है। लेखक का निष्कर्ष है कि जिस तरह विदेश नीति की कोई निश्चित दिशा नहीं है, उसी तरह जनता की सोच को भी आसानी से बदला जा सकता है।
देशकी विदेश नीति का यह रवैया शायद दूसरे देशों का भी मनोरंजन कर रहा है और कई प्रमुख राष्ट्राध्यक्ष भी नरेंद्र मोदी के खोखलेपन को समझ लेने के बाद अपना लक्ष्य तय कर आगे बढ़ रहे हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि अमेरिका सिर्फ अपना फायदा देखता है और चीन की सोच भारतीय जमीन पर और अधिक कब्जा करना है।
अपने चक्कर में भारत ने पहले ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ रिश्ते बिगाड़ रखे हैं। अब नेपाल में भी नये किस्म की आग लगी हुई है। ऐसे में भारत किस रास्ते आगे बढ़ता है, यह देखने वाली बात होगी। लेकिन खुद नरेंद्र मोदी अपने पुराने बयानों की वजह से खुद ही अब सवालों में घिर गये हैं, इसे लेकर संदेह की कोई गुंजाइश अब नहीं बची है।