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चीन पर भरोसा की जल्दबाजी गलत होगी

अचानक से देश के भाजपा समर्थक डोनाल्ड ट्रंप से नाराजगी की वजह से शी जिनपिंग को बेहतर मानने लगे हैं। पहला सवाल यह है कि किसी अन्य अमेरिकी ने नरेंद्र मोदी से अमेरिका जाकर ट्रंप का प्रचार करने को नहीं कहा था। यह भी सर्वविदित सत्य है कि अमेरिका एक ऐसा देश है, जहां किसी की भी सरकार हो, उसकी प्राथमिकता अमेरिकी हित होती है और अमेरिकी कारोबार का असली धंधा हथियारों की बिक्री है।

इसलिए अगर वहां से झटका लगा तो इसका यह अर्थ नहीं कि हम आनन फानन में शी जिनपिंग अथवा चीन की सरकार को अपना करीबी मान लें क्योंकि पंडित नेहरू के इसी भरोसे की वजह से 1962 का युद्ध हुआ था, जिसमें हम परास्त हुए थे। जब तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हाथ मिलाते हुए तस्वीरें सामने आईं, तो यह दृश्य कई लोगों के लिए आश्चर्यजनक था।

यह सिर्फ एक शिष्टाचार मुलाकात नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी। यह एक ऐसा संकेत था कि भारत अपने उत्तरी पड़ोस में स्थित इन दो महाशक्तियों के साथ संबंधों को एक और मौका देने के लिए तैयार है, भले ही उनके अतीत के व्यवहार पर संदेह हो। यह घटना इस सवाल को फिर से खड़ा करती है: क्या यह मेल-मिलाप का एक नया दौर है या सिर्फ एक और अवसर जब भारत इन संबंधों की जटिलताओं पर चिंतन कर रहा है?

भारत और चीन के बीच संबंधों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 1962 के युद्ध से लेकर डोकलाम और गलवान घाटी की हालिया झड़पों तक, दोनों देशों के बीच तनाव एक स्थायी विशेषता रही है। गलवान की घटना, जिसमें भारतीय सेना के 20 जवान शहीद हुए, ने संबंधों को एक नए निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। इसके बाद, भारत ने चीन के खिलाफ कई आर्थिक और रणनीतिक कदम उठाए, जिसमें चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध और चीनी कंपनियों पर सख्त नियंत्रण शामिल थे। इन कदमों से भारत ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वह अपनी संप्रप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।

लेकिन, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में स्थायी दुश्मनी या दोस्ती नहीं होती। यह स्थिति भारत के लिए भी उतनी ही सच है। एससीओ जैसे बहुपक्षीय मंचों पर भारत की भागीदारी यह दर्शाती है कि वह चीन और रूस के साथ संवाद के रास्ते खुले रखना चाहता है। इसका एक प्रमुख कारण भू-राजनीतिक वास्तविकताएं हैं।

चीन एक आर्थिक महाशक्ति है और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उससे पूरी तरह से संबंध तोड़ लेना भारत की आर्थिक प्रगति के लिए हानिकारक हो सकता है। इसी तरह, रूस भारत का एक पुराना और भरोसेमंद रक्षा भागीदार रहा है। यूक्रेन युद्ध के बावजूद, भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखा है, क्योंकि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों और रक्षा क्षमताओं के लिए रूस पर निर्भर है।

मोदी-शी की मुलाकात को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह एक तरफ भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को दर्शाती है, यानी अपनी विदेश नीति को स्वतंत्र रूप से चलाने की क्षमता, बिना किसी दबाव के। भारत न तो अमेरिका के खेमे में पूरी तरह शामिल होना चाहता है और न ही चीन-रूस के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह खत्म करना चाहता है।

भारत की नीति हमेशा से अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखने की रही है। एससीओ शिखर सम्मेलन की मुलाकात इसी नीति का एक हिस्सा है। यह एक ऐसा मौका था जब भारत ने दिखाया कि वह अपने विरोधियों के साथ भी बातचीत कर सकता है। हालांकि, यह भी सच है कि भारत के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। चीन के साथ सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा है।

चीन लगातार अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। उसकी ‘वन बेल्ट वन रोड’ पहल भारत की संप्रभुता के लिए एक बड़ा खतरा है। इसके अलावा, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति भी भारत के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में, भारत के लिए चीन पर भरोसा करना आसान नहीं है।

यह मुलाकात शायद चीन के लिए भी एक संकेत थी। चीन को यह एहसास हो चुका है कि भारत अब 1962 वाला भारत नहीं है। भारत अब एक मजबूत आर्थिक और सैन्य शक्ति है। वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात मजबूती से रख रहा है। चीन के लिए भी यह जरूरी है कि वह भारत के साथ अपने संबंधों को स्थिर रखे, खासकर जब वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ तनावपूर्ण संबंधों का सामना कर रहा है। भारत जैसी चुनौतियां चीन के सामने भी है। फर्क सिर्फ यह है कि वहां की जनता को अब अपनी ताकत का एहसास हो गया है और वहां लोकतांत्रिक सरकार नहीं है।