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जीएसटी पर फैसला काफी देर से

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दरों को युक्तिसंगत बनाने के लिए गठित मंत्रिसमूह (जीओएम) द्वारा मौजूदा कर स्लैब के पुनर्गठन के केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर सहमति जताए जाने के साथ ही, जीएसटी व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव होने वाला है। प्रस्ताव है कि 12 प्रतिशत और 28 प्रतिशत के स्लैब को हटाकर उन्हें 5 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की निचली दरों के साथ समेकित किया जाए।

इससे कर ढांचा सरल और युक्तिसंगत होगा, जिससे कई वस्तुएं और सेवाएं सस्ती हो जाएंगी। 12 प्रतिशत कर वाली लगभग 99 प्रतिशत वस्तुओं को 5 प्रतिशत स्लैब में और 28 प्रतिशत वाले 90 प्रतिशत को 18 प्रतिशत स्लैब में डाल दिया जाएगा। लेकिन विलासिता और अहितकर वस्तुओं के उपभोग को हतोत्साहित करने के लिए उनके लिए 40 प्रतिशत का एक नया स्लैब बनाया जा सकता है।

ढांचे का सरलीकरण केवल स्लैब की संख्या कम करने तक ही सीमित नहीं है। इसमें रिटर्न की प्रक्रिया, पंजीकरण को आसान बनाना और रिफंड में तेजी लाने सहित प्रक्रियाओं को सरल बनाना भी शामिल है। सरकार ने संसद के मानसून सत्र में पारित नए आयकर विधेयक में कर स्लैब में भी बदलाव किया है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों कर कानूनों में बदलाव से राजस्व में गिरावट आने की संभावना है।

जीएसटी दर (भारित औसत) 2017 में 14.4 प्रतिशत से घटकर सितंबर 2019 तक 11.6 प्रतिशत हो गई थी। अब इसमें और गिरावट आने की संभावना है। कर दरों में कमी से उपभोग में वृद्धि और कर आधार का विस्तार होना तय है। प्रक्रियाओं के सरलीकरण से अनुपालन में वृद्धि होने की संभावना है।

जब कई वस्तुओं पर कर की दर 5 प्रतिशत जितनी कम होगी, तो कर चोरी और कर चोरी के लिए बहुत कम प्रोत्साहन मिलेगा। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि अधिकारियों की ओर से विवेकाधीन कार्रवाई और भ्रष्टाचार कम होगा। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन के तहत अमेरिका द्वारा घोषित टैरिफ युद्ध ने सरकार को जीएसटी सुधारों में तेजी लाने के लिए प्रेरित किया होगा।

यदि अमेरिकी प्रशासन उच्च टैरिफ पर अड़ा रहता है, तो भारत की विकास दर प्रभावित होगी। उम्मीद है कि कम कर दरों के परिणामस्वरूप घरेलू उपभोग में वृद्धि आर्थिक विकास को गति दे सकती है। कर का बोझ कम होने से विशेष रूप से एमएसएमई को मदद मिल सकती है, जिनकी जीडीपी में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है।

लेकिन जिन राज्यों की कर प्रणाली में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है, उन्हें दरों में कमी से होने वाले राजस्व नुकसान की चिंता है। वे अपने नुकसान की भरपाई की मांग कर सकते हैं। इन चिंताओं का समाधान करना होगा, खासकर जब कई राज्यों को राजस्व बंटवारे के अन्य पहलुओं पर शिकायतें हैं। दुर्भाग्य है कि कई स्तरों पर विशेषज्ञों ने वर्तमान ढांचे पर सवाल उठाते हुए सरकार का ध्यान इस तरफ आकृष्ट किया था।

यह बताया गया था कि सिर्फ अफसरशाही की वजह से एक ही पदार्थ के अलग अलग स्वरुप के अलग अलग जीएसटी ने कारोबारी हित को प्रभावित किया है। दूसरी तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बार बार कहा था कि इस कर ढांचा से देश के लघु और मध्यम व्यापारी सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं, जो दरअसल सबसे अधिक रोजगार पैदा करते हैं।

लेकिन उस वक्त सरकार में बैठे लोगों को यह राजनीतिक बयान लगा था, लिहाजा उस पर ध्यान नहीं दिया गया। अब बदलते माहौल में सरकार के शीर्ष तक यह सूचना पहुंच चुकी है कि इस कर ढांचा ने देश की जनता के बहुमत को नाराज कर दिया है और इससे भाजपा के चुनावी फायदे को नुकसान पहुंचने वाला है। इसके बाद ही सरकार की तरफ से इसमें सुधार करने की पहल हुई है।

लेकिन यह सोचने वाली बात है कि बिना सोचे समझे लागू जीएसटी की वजह से जो लाखों उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंच गये, उन्हें फिर से स्थापित करना अब आसान काम नहीं रह गया है। एक सामान्य अनुमान है कि चंद बड़े पूंजीपतियों को जो कर्जमाफी दी गयी, वही पैसा अगर लघु और मध्यम उद्योग को मिलता तो देश की आर्थिक हालात कुछ और होती।

सरकार की तरफ से निर्णय लेने में यह देरी देश के लिए नुकसानदायक साबित हुई है। जीब बात यह है कि कर्जमाफी को भी सरकार शब्दों की हेराफेरी कर राइट ऑफ कहती रही है। इस बारे में केजरीवाल ने उसी खाते में दूसरे लोगों को लाभ दिलाने की बात कही थी। दरअसल इसके मूल में सरकार का सिर्फ मुनाफा कमाने की सोच हावी है। भारत जैसे देश में सरकार की कल्पना दरअसल लोककल्याणकारी एजेंसी के तौर पर की गयी थी। सरकार पर हावी बाजारवाद की सोच ने इस मूल धारणा को ही समाप्त कर दिया है।