तीन बिलों से उठा राजनीतिक विवाद
हाल ही में संसद में पेश किए गए तीन नए विधेयकों पर जोरदार बहस छिड़ गई है, जिसने न केवल संसद के गलियारों में बल्कि आम जनता के बीच भी तीखी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की हैं। इन विधेयकों को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है और इन्हें कठोर, असंवैधानिक और ध्यान भटकाने वाला करार दिया है।
विपक्ष का आरोप है कि ये विधेयक केंद्र सरकार को विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्य सरकारों को अस्थिर करने का एक नया हथियार देंगे। इस पूरे विवाद का केंद्र एक विवादास्पद प्रस्ताव है, जिसके अनुसार अगर कोई मंत्री, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री 30 दिनों तक जेल में रहता है, तो उसे पद से हटा दिया जाएगा।
संसद में पेश किए गए इस संविधान संशोधन विधेयक में यह प्रस्ताव है कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी मंत्री, जिसे कम से कम पाँच साल की जेल की सजा वाले अपराधों के लिए लगातार 30 दिनों तक गिरफ्तार और हिरासत में रखा गया हो, को पद से हटा दिया जाएगा। इस विधेयक पर चल रहे विवाद के बीच, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने इसे असाधारण और स्पष्ट रूप से असंवैधानिक बताया है।
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर सवाल उठाते हुए कहा, अगर किसी गिरफ्तार मुख्यमंत्री को 30 दिनों में जमानत नहीं मिलती, तो वह मुख्यमंत्री नहीं रहेगा! क्या आपने कानून की दुनिया में इससे ज्यादा अजीबोगरीब कुछ सुना है? चिदंबरम ने आगे कहा कि इस कानून के तहत, कोई आरोप नहीं, कोई मुकदमा नहीं, कोई दोषसिद्धि नहीं, लेकिन चुनाव में जनता का फैसला सिर्फ एक गिरफ्तारी (जो अक्सर फर्जी आरोपों पर आधारित होती है) से पलट दिया जाएगा।
उन्होंने न्यायपालिका की मौजूदा स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की, जहां निचली अदालतें शायद ही जमानत देती हैं और उच्च न्यायालय भी इस मामले में अनिच्छुक रहते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि हर महीने हजारों जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचती हैं, और इस प्रक्रिया में कई सप्ताह लग जाते हैं। इस बीच, 30 दिन बीत जाएंगे और चुनी हुई सरकार अस्थिर हो जाएगी।
उन्होंने पूछा, क्या इससे ज्यादा गैरकानूनी, असंवैधानिक, लोकतंत्र-विरोधी और संघीय-विरोधी कुछ हो सकता है? विपक्ष का आरोप है कि इस तरह के कानून से राज्य सरकारों को अस्थिर करने का रास्ता साफ हो जाएगा, खासकर उन राज्यों में जहां विपक्षी दल सत्ता में हैं।
उनका कहना है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार, केंद्रीय जांच एजेंसियों जैसे प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) का दुरुपयोग करके गैर-भाजपा मुख्यमंत्रियों को फंसाने, उन्हें जेल में डालने और फिर उन्हें पद से हटाने की साजिश रच रही है।
दूसरी ओर, गृह मंत्री अमित शाह ने इस कानून को लाने का उद्देश्य राजनीति में गिरते नैतिक मानकों को ऊपर उठाना और ईमानदारी बनाए रखना बताया है। उनका तर्क है कि अगर कोई जन प्रतिनिधि गंभीर अपराधों में शामिल पाया जाता है और लंबे समय तक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है।
हाल के घटनाक्रमों को देखें तो दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, वरिष्ठ मंत्री सत्येंद्र जैन और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के उदाहरण इस विवाद को और गहरा करते हैं। इन सभी नेताओं को भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार किया गया था।
अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया का मामला: भाजपा ने दिल्ली शराब घोटाला का जमकर प्रचार किया और इस मामले में मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार किया गया। हालांकि, इन मामलों की वर्तमान स्थिति पर भाजपा के नेता ज्यादा बात नहीं करते। सत्येंद्र जैन के मामले में तो जांच एजेंसी ने ही क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी, जिसका मतलब है कि मामले में कोई सबूत नहीं मिला है।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जमीन घोटाले के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, जिस जमीन के मामले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था, वह न तो उनके नाम पर थी और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य के नाम पर। इसके बावजूद, उन्हें जेल जाना पड़ा।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि जिस प्रकार से केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है, वह एक गंभीर चिंता का विषय है। अगर नया कानून लागू होता है, तो ऐसे तमाम राजनीतिक व्यक्तियों को सिर्फ 30 दिन की जेल के बाद अपने पद से हाथ धोना पड़ेगा, भले ही बाद में वे निर्दोष साबित हो जाएं।
यह विपक्ष को कुचलने की एक और साजिश लगती है, जहां कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया है और सिर्फ गिरफ्तारी ही किसी नेता को पद से हटाने का आधार बन गई है। यह विधेयक नैतिकता और ईमानदारी के नाम पर लाया गया है, लेकिन इसके परिणाम लोकतंत्र और संघवाद के लिए घातक हो सकते हैं।