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दिशोम गुरु शिबू सोरेन, महाजनी कारोबार के खिलाफ आंदोलन से मुख्यधारा की राजनीति

रजत कुमार गुप्ता

शिबू सोरेन, जिन्हें उनके समर्थक दिशोम गुरु (देश के गुरु) के नाम से जानते हैं, भारतीय राजनीति में एक ऐसा नाम हैं जो झारखंड राज्य के गठन और आदिवासी अधिकारों के लिए उनके अथक संघर्ष का पर्याय बन गया है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर, उन्होंने न केवल आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया बल्कि उन्हें संगठित कर एक अलग राज्य की मांग को राष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया। उनका जीवन, संघर्ष और राजनीतिक यात्रा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी, 1944 को झारखंड के हजारीबाग जिले (अब रामगढ़ जिले में) के नेमरा गांव में हुआ था। उनका जन्म एक संथाल आदिवासी परिवार में हुआ। उनके पिता, सोबरन सोरेन, एक शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता थे, जिन्होंने आदिवासियों के बीच शिक्षा और जागरूकता फैलाने का काम किया। शिबू सोरेन के प्रारंभिक जीवन पर उनके पिता का गहरा प्रभाव पड़ा, जिन्होंने उन्हें आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया। बचपन से ही उन्होंने अपने आसपास आदिवासियों के शोषण और उत्पीड़न को देखा, जिसने उनके मन में न्याय और समानता के बीज बोए।

शिक्षा: शिबू सोरेन की औपचारिक शिक्षा बहुत अधिक नहीं रही। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने पैतृक गांव में ही प्राप्त की। हालांकि, उनकी औपचारिक शिक्षा सीमित थी, लेकिन उन्होंने अपने पिता से और अपने अनुभवों से बहुत कुछ सीखा। उन्हें आदिवासी भाषाओं और लोककथाओं का गहरा ज्ञान था। उनकी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति शिक्षित करना और उन्हें संगठित करना था, जिसके लिए उन्होंने बाद में कई मंचों का उपयोग किया। उनकी शुरुआती जिंदगी में ही उन्हें यह अहसास हो गया था कि केवल शिक्षा ही आदिवासियों को गरीबी, शोषण और अभावों से मुक्ति दिला सकती है।

पारिवारिक जीवन और प्रारंभिक प्रभाव: शिबू सोरेन का विवाह रुक्मिणी देवी से हुआ और उनके चार बच्चे हैं।

उनके परिवार ने उनकी राजनीतिक यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और उनके बच्चों ने भी झारखंड की राजनीति में अपनी पहचान बनाई है। उनके पिता, सोबरन सोरेन, की हत्या ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। यह घटना उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई और उन्होंने खुद को आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने और आदिवासियों को शोषण से मुक्त करने के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया। उनके पिता की हत्या के पीछे महाजनों और बाहरी लोगों का हाथ माना जाता था, जो आदिवासियों की जमीन हड़प लेते थे और उन्हें कर्ज के जाल में फंसाते थे। इस घटना ने शिबू सोरेन को इस शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने के लिए प्रेरित किया।

जिस समय शिबू सोरेन बड़े हो रहे थे, उस समय छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासी समुदाय गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा था। महाजन, ठेकेदार और बाहरी लोग आदिवासियों की जमीनें हड़प रहे थे, उन्हें कम मजदूरी दे रहे थे, और उन्हें कर्ज के जाल में फंसा रहे थे। जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकार छीने जा रहे थे। इस शोषण ने आदिवासियों को गरीबी, बीमारी और सामाजिक उत्पीड़न में धकेल दिया था। शिबू सोरेन ने इस स्थिति को करीब से देखा और महसूस किया कि जब तक आदिवासी एकजुट होकर अपने अधिकारों के लिए नहीं लड़ेंगे, तब तक उनका उत्थान संभव नहीं है। यह सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि ही उनके भविष्य के आंदोलनों और राजनीतिक दर्शन की नींव बनी।

शिबू सोरेन ने अपने आंदोलन की शुरुआत महाजनों और सूदखोरों द्वारा आदिवासियों के शोषण के खिलाफ की। 1970 के दशक में, उन्होंने महाजन भगाओ, खेत बचाओ आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को महाजनों के चंगुल से मुक्त कराना और उनकी छीनी गई जमीनों को वापस दिलाना था। उन्होंने आदिवासियों को संगठित किया, उन्हें महाजनों के कर्ज चुकाने से रोकने के लिए प्रेरित किया, और कई मौकों पर आदिवासियों की छीनी गई जमीनों को बलपूर्वक वापस दिलवाया। यह आंदोलन इतना प्रभावी हुआ कि इसने पूरे छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासियों के बीच एक नई चेतना जगाई।

1972 में, शिबू सोरेन ने विनोद बिहारी महतो और कामरेड एके रॉय के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। जेएमएम का गठन आदिवासी अधिकारों की रक्षा, शोषण के खिलाफ संघर्ष और एक अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर किया गया था। शिबू सोरेन को जेएमएम का महासचिव बनाया गया, और बाद में वे इसके अध्यक्ष बने। जेएमएम ने आदिवासियों, दलितों और शोषितों को एकजुट करने का काम किया और झारखंड आंदोलन को एक नई दिशा दी। इस पार्टी का मुख्य एजेंडा जल, जंगल, जमीन पर आदिवासियों के अधिकार को फिर से स्थापित करना था।

दिशोम गुरु का उदय: महाजनी प्रथा के खिलाफ उनके संघर्ष और झारखंड आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका के कारण शिबू सोरेन को जल्द ही दिशोम गुरु (देश के गुरु) की उपाधि मिल गई। आदिवासियों ने उन्हें अपना नेता, मार्गदर्शक और उद्धारकर्ता मानना शुरू कर दिया। उनकी पहचान एक ऐसे नेता के रूप में बनी जो आदिवासियों के दुःख-दर्द को समझता था और उनके लिए लड़ने को तैयार था। उनकी ओजस्वी भाषण शैली और आदिवासियों के साथ सीधा जुड़ाव उनकी लोकप्रियता का कारण बना।

जेएमएम के बैनर तले शिबू सोरेन ने कई जंगल सत्याग्रह और अन्य आंदोलनों का नेतृत्व किया। इन आंदोलनों का उद्देश्य आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों, विशेषकर जंगलों और वनोपज पर उनके अधिकार को बहाल करना था। उन्होंने वन विभाग और ठेकेदारों द्वारा आदिवासियों के शोषण का विरोध किया। इन आंदोलनों ने सरकार पर दबाव डाला और आदिवासियों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए मजबूर किया। शिबू सोरेन ने शिक्षा के महत्व पर भी जोर दिया और आदिवासियों को शिक्षित होने के लिए प्रेरित किया, यह मानते हुए कि शिक्षा ही उनके उत्थान का मार्ग है।

झारखंड राज्य के लिए संघर्ष शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन का केंद्रीय बिंदु रहा है। उन्होंने दशकों तक इस मांग को लेकर आंदोलन किया। उन्होंने कई रैलियां, प्रदर्शन और बंद आयोजित किए, और केंद्रीय सरकारों पर दबाव डाला। झारखंड आंदोलन को अक्सर हिंसा और अशांति का सामना करना पड़ा, लेकिन शिबू सोरेन ने हार नहीं मानी। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों और आदिवासी संगठनों को एक साथ लाने का प्रयास किया ताकि झारखंड की मांग को मजबूत किया जा सके। उनकी लगातार कोशिशों और आंदोलन के दबाव के कारण ही अंततः केंद्र सरकार को झारखंड राज्य के गठन पर विचार करना पड़ा।

शिबू सोरेन ने पहली बार 1980 में दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और हार गए। हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और 1989 में दुमका से लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार संसद पहुंचे। संसद में उन्होंने झारखंड की मांग को मजबूती से उठाया और आदिवासियों के मुद्दों पर आवाज बुलंद की। उनका संसद में प्रवेश झारखंड आंदोलन के लिए एक बड़ी सफलता थी, क्योंकि अब उनकी आवाज राष्ट्रीय मंच पर गूंजने लगी थी।

शिबू सोरेन के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 15 नवंबर, 2000 को अलग झारखंड राज्य का गठन था। यह उनके दशकों के संघर्ष और आंदोलन का परिणाम था। झारखंड के गठन के बाद, शिबू सोरेन को झारखंड निर्माता के रूप में सम्मानित किया गया। हालांकि, वे झारखंड के पहले मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, लेकिन उनके संघर्ष ने ही राज्य के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

पहला कार्यकाल (2 मार्च 2005 – 12 मार्च 2005): वे झारखंड के तीसरे मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत साबित न कर पाने के कारण केवल 10 दिनों में इस्तीफा देना पड़ा। यह उनके लिए एक निराशाजनक शुरुआत थी, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

दूसरा कार्यकाल (27 अगस्त 2008 – 19 जनवरी 2009): इस बार वे भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने, लेकिन एक उपचुनाव में हारने के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

तीसरा कार्यकाल (30 दिसंबर 2009 – 29 मई 2010): उन्होंने कांग्रेस और आरजेडी के समर्थन से फिर से मुख्यमंत्री का पद संभाला, लेकिन समर्थन वापस लेने के कारण उन्हें फिर इस्तीफा देना पड़ा।

उनके मुख्यमंत्री के रूप में छोटे-छोटे कार्यकाल के बावजूद, उन्होंने आदिवासी कल्याण और राज्य के विकास के लिए कई नीतियां बनाने का प्रयास किया। उन्होंने आदिवासियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों को बढ़ाने पर जोर दिया।

शिबू सोरेन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री भी रहे हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में उन्होंने कोयला क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों और उनकी भागीदारी को सुनिश्चित करने का प्रयास किया। उन्होंने कोयला खदानों में स्थानीय लोगों को रोजगार देने और विस्थापितों के पुनर्वास के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।

शिबू सोरेन ने लोकसभा के अलावा राज्यसभा में भी झारखंड का प्रतिनिधित्व किया है। वर्तमान में, वे राज्यसभा के सदस्य हैं। राज्यसभा में भी वे झारखंड के मुद्दों और आदिवासी कल्याण के लिए आवाज उठाते रहते हैं।

शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और लंबे समय से इसके अध्यक्ष हैं। उनके नेतृत्व में जेएमएम झारखंड की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति बनी हुई है, खासकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में। उन्होंने पार्टी को एकजुट रखने और आदिवासी हितों का प्रतिनिधित्व करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

शिबू सोरेन का नाम चिरुडीह नरसंहार मामले से जुड़ा रहा है। 1980 के दशक में हुए इस नरसंहार में 11 मुस्लिम व्यक्तियों की हत्या कर दी गई थी। शिबू सोरेन पर इस घटना को उकसाने का आरोप लगा था। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद, 2008 में दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया, लेकिन यह मामला उनके राजनीतिक जीवन पर एक धब्बे की तरह रहा।

शिबू सोरेन को 1994 में उनके पूर्व निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के आरोप में 2006 में दोषी ठहराया गया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के बाद उन्हें केंद्रीय मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हालांकि, बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया। यह मामला उनके राजनीतिक करियर के सबसे बड़े झटकों में से एक था और इसने उनकी छवि को काफी नुकसान पहुंचाया।

झारखंड राज्य के गठन के बाद से ही राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही है। शिबू सोरेन खुद कई बार मुख्यमंत्री बने और हटे। उन्हें अक्सर गठबंधन सरकारें बनानी पड़ीं जो अल्पकालिक साबित हुईं। यह अस्थिरता राज्य के विकास के लिए एक बड़ी चुनौती रही है और शिबू सोरेन के नेतृत्व को भी प्रभावित करती रही है। गठबंधन की राजनीति में उन्हें अक्सर अपनी पार्टी के हितों को साधने और अन्य दलों के साथ सामंजस्य बिठाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

अन्य कई राजनेताओं की तरह, शिबू सोरेन पर भी आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि, इन आरोपों को कभी भी पूरी तरह से साबित नहीं किया जा सका। ऐसे आरोप अक्सर भारतीय राजनीति में राजनेताओं के खिलाफ लगाए जाते हैं, और शिबू सोरेन भी इससे अछूते नहीं रहे हैं।

बढ़ती उम्र के साथ शिबू सोरेन को स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हालांकि, वे सक्रिय राजनीति में बने हुए हैं और अपनी पार्टी का मार्गदर्शन करते रहते हैं। उनका स्वास्थ्य उनके परिवार और समर्थकों के लिए चिंता का विषय रहा है, लेकिन वे फिर भी झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

शिबू सोरेन को निःसंदेह झारखंड राज्य के सबसे महत्वपूर्ण वास्तुकारों में से एक माना जाता है। उनके दशकों के संघर्ष और समर्पण के बिना शायद झारखंड का गठन संभव नहीं हो पाता। उन्होंने आदिवासियों को एक साथ लाया, उन्हें उनके अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया, और एक अलग राज्य की मांग को एक जन आंदोलन में बदल दिया।

शिबू सोरेन ने आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन पर उनके पारंपरिक अधिकारों के लिए जीवन भर संघर्ष किया। उन्होंने महाजनी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और आदिवासियों को शोषण से मुक्त करने का प्रयास किया। वे हमेशा आदिवासी संस्कृति, भाषा और परंपराओं के संरक्षक रहे हैं। उनके प्रयासों से आदिवासियों को अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक होने में मदद मिली है।

वे न केवल आदिवासियों बल्कि सभी शोषितों और वंचितों के अधिकारों के लिए भी लड़े। उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों को बढ़ावा दिया। उनकी राजनीति का मूल शोषितों को सशक्त बनाना और उन्हें मुख्यधारा में लाना रहा है।

शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया है। उनके नेतृत्व में जेएमएम ने झारखंड की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और राज्य की कई सरकारों में भागीदार रही है। उन्होंने पार्टी को आदिवासियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक मजबूत मंच के रूप में बनाए रखा है।

शिबू सोरेन ने अपने बेटे हेमंत सोरेन को झारखंड की राजनीति में स्थापित किया है और उन्हें जेएमएम के नेतृत्व की बागडोर सौंपी है। हेमंत सोरेन वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री हैं, जो शिबू सोरेन की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। यह शिबू सोरेन की दूरदर्शिता को दर्शाता है कि उन्होंने अपनी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया है।

भले ही उनके करियर में कई विवाद और आलोचनाएं रहीं, लेकिन झारखंड के लोग, विशेषकर आदिवासी समुदाय, उन्हें दिशोम गुरु के रूप में अत्यधिक सम्मान देते हैं। उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जिसने आदिवासियों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी जन-आधारित राजनीति और आदिवासियों के साथ सीधा जुड़ाव उन्हें लोकप्रिय बनाए रखता है।