बिहार मतदाता सूची संशोधन पर विवाद
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नागरिकता सत्यापन के दावे पर एडीआर का खंडन
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स्वीकार्य दस्तावेजों पर बेहद बेतुका मानदंड
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संशोधन प्रक्रिया में घोर धोखाधड़ी का आरोप
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने बिहार में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसमें मतदाताओं की नागरिकता सत्यापन के तरीके और समय पर सवाल उठाए गए हैं। एडीआर ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयोग के जवाब में तर्क दिया है कि मतदाताओं की नागरिकता सत्यापित करने का संवैधानिक अधिकार होने का आयोग का दावा पिछले सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों के विपरीत है। यह विवाद आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने की आशंका को लेकर गहराता जा रहा है।
चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने हलफनामे में तर्क दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत मतदाताओं की नागरिकता सत्यापित करना उसके अधिकारों के भीतर है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची से नाम हटाने का मतलब किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त करना नहीं है।
हालांकि, एडीआर ने चुनाव आयोग के इस तर्क का पुरजोर खंडन किया है। एडीआर का दावा है कि आयोग का यह रुख सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों की अवहेलना करता है। एडीआर ने यह भी सवाल उठाया है कि चुनाव आयोग ने उन विशिष्ट परिस्थितियों या कानूनी प्रावधानों का उल्लेख क्यों नहीं किया, जिनके तहत उसे नागरिकता सत्यापन का अधिकार मिलता है, खासकर जब पिछले फैसलों में इस मुद्दे पर स्पष्टता दी गई है।
मतदाता सूची के संशोधन के दौरान स्वीकार्य दस्तावेजों की सूची से आधार और राशन कार्ड को बाहर करने के चुनाव आयोग के फैसले को एडीआर ने बेहद बेतुका बताया है। एडीआर ने इस बात पर जोर दिया है कि पासपोर्ट, जाति प्रमाण पत्र और स्थायी निवास दस्तावेजों के लिए आवेदन करते समय आधार कार्ड को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है, फिर मतदाता सूची संशोधन के लिए इसे अस्वीकार करना तर्कहीन है।
यह फैसला लाखों मतदाताओं के लिए अनावश्यक बाधाएं खड़ी कर सकता है, खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास अन्य पहचान पत्र आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। इससे गरीब और वंचित वर्ग के मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने का खतरा बढ़ जाता है, जो मुख्य रूप से आधार और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों पर निर्भर रहते हैं।
एडीआर ने चुनाव आयोग पर यह आरोप भी लगाया है कि वह यह बताने में विफल रहा है कि आगामी विधानसभा चुनावों से पहले इस संशोधन प्रक्रिया को इतनी जल्दबाजी में क्यों किया जाना चाहिए। 24 जून को घोषित बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने अपने समय और 2003 के बाद नामांकित मतदाताओं को मतदाता सूची में बने रहने के लिए कई दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता, दोनों को लेकर विवाद खड़ा कर दिया है।
एडीआर ने इस पूरी प्रक्रिया को राज्य के मतदाताओं के साथ घोर धोखाधड़ी करार दिया है। उनका तर्क है कि यह जल्दबाजी और जटिल दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकता जानबूझकर बड़ी संख्या में मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का एक प्रयास हो सकता है। यह आरोप भारतीय लोकतंत्र की नींव को हिलाता है, क्योंकि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव ही लोकतंत्र की पहचान हैं। इस मामले ने अंततः सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौतियों का सामना किया है। न्यायालय के निर्देशों पर कार्रवाई करते हुए, एडीआर ने 21 जुलाई को आयोग द्वारा प्रस्तुत किए गए जवाबी हलफनामे पर अपना प्रत्युत्तर दायर किया। मामले की अगली सुनवाई 28 जुलाई को सूचीबद्ध है।