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जाति जनगणना: एक बहुप्रतीक्षित कदम और इसके निहितार्थ

भारत में जाति जनगणना का मुद्दा लंबे समय से बहस का विषय रहा है और अब यह एक ऐतिहासिक मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। हाल ही में मोदी सरकार ने अगली जनगणना को जाति आधारित बनाने का फैसला किया है, जिसे व्यापक रूप से समर्थन मिला है। यह निर्णय इस बात को स्वीकार करता है कि हमारे समाज में जाति व्यवस्था की गहरी जड़ें आज भी मौजूद हैं, भले ही हम इसकी कितनी भी आलोचना क्यों न करें। समाज के वंचित तबकों के उत्थान और उनके लिए सटीक नीतियों के निर्माण हेतु व्यापक आंकड़े जुटाना अत्यंत आवश्यक है। जाति जनगणना के माध्यम से हमें यह जानने को मिलेगा कि किस जाति के कितने लोग हैं, उनके जीवन स्तर में क्या बदलाव आए हैं, और उनकी वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं। इन आंकड़ों के बिना, किसी भी तरह की वैज्ञानिक रणनीति बनाना असंभव है जो भारत की विविधता को समाहित कर सके और सभी वर्गों की समग्र प्रगति सुनिश्चित कर सके। जाति जनगणना की मांग मुख्य रूप से क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा उठाई जाती रही है। इन दलों का मानना है कि कई जातियों को उनकी संख्या के अनुपात में उचित सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जो कि काफी हद तक सत्य भी है। हालांकि, पिछली सरकारों ने इस मुद्दे को सामाजिक विभाजन बढ़ने के डर से टाल दिया था। जाति जनगणना का मुद्दा अपनी संवेदनशीलता के कारण अक्सर राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किए जाने की आशंका से घिरा रहता है। बिहार और कर्नाटक में जाति सर्वेक्षणों को लेकर चल रही राजनीतिक बहसें इस बात का स्पष्ट उदाहरण हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एन.वी. रमना ने सही कहा है कि जाति और जाति आधारित भेदभाव हमारे समाज की कठोर सच्चाई है, जिससे हम लंबे समय से मुंह मोड़ते रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम सब मिलकर इस पर काम करें। भारत में जाति जनगणना का एक लंबा इतिहास रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान 1872 की जनगणना में पहली बार जाति के आधार पर जनसंख्या की गणना करने का प्रयास किया गया था। इसके बाद 1931 तक यह सिलसिला हर 10 साल में चलता रहा। आजादी के बाद, 1951 की जनगणना में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आंकड़े एकत्र किए गए, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) या सामान्य वर्ग के आंकड़े शामिल नहीं किए गए। 1979 में, तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने पिछड़े वर्गों को समुचित आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग का गठन किया।

इस कदम के बाद जाति जनगणना का मुद्दा सीधे आरक्षण से जुड़ गया, जिससे इसके विश्लेषणात्मक लाभों को दरकिनार कर दिया गया और किसी भी सरकार ने इसे फिर से उठाने की हिम्मत नहीं दिखाई।

अक्सर यह तर्क दिया जाता था कि यदि हमारा संविधान सभी के लिए समान अवसर की बात करता है और हम जाति व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास कर रहे हैं, तो जाति जनगणना कराना कैसे उचित हो सकता है? डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर ने भी जाति आधारित भेदभाव को समाज का अभिशाप बताया था और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने की वकालत की थी।

जब भी जाति जनगणना का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है, तो अक्सर इस बात पर अटका रहा है कि संविधान जाति के आधार पर जनगणना की इजाजत नहीं देता। हालांकि, 2010 में बड़ी संख्या में सांसदों ने इसकी मांग की, और तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 2011 में सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में जाति जनगणना कराई, लेकिन इसके आंकड़े कभी सार्वजनिक नहीं किए गए, जिससे किसी भी तरह का विश्लेषण संभव नहीं हो सका।

हाल ही में, सितंबर 2024 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने जाति जनगणना पर कोई आपत्ति न होने की बात कही, जिसके बाद भाजपा ने भी इसका समर्थन किया। आरएसएस के राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने जोर देकर कहा कि जाति जनगणना के आंकड़ों का उपयोग नीति-निर्माण में मदद के लिए होना चाहिए, न कि चुनावी उद्देश्यों के लिए। यह एक ऐसी उम्मीद है जिसे हम सभी को बनाए रखना चाहिए। जाति आधारित जनगणना का मुख्य उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक विभाजन को पाटना और यह सुनिश्चित करना है कि समाज के सभी वर्गों को सत्ता और समृद्धि में उचित हिस्सा मिले।
यह एक समयबद्ध तरीके से होनी चाहिए और इसका लाभ उन समुदायों तक पहुंचना चाहिए जिन्हें अभी तक विकास का पूरा फायदा नहीं मिला है।यह देखने वाली बात होगी कि क्या जाति आधारित जनगणना सभी को न्याय दिला पाएगी। हालांकि, एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि जनगणना में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए एक अलग श्रेणी शामिल की जानी चाहिए। इससे सभी पृष्ठभूमि के लोगों को इस प्रक्रिया का लाभ मिल सकेगा और यह सुनिश्चित हो सकेगा कि विकास का फल समाज के हर तबके तक पहुंचे।