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कामाख्या में अंबुवासी महायोग: आस्था, तंत्र और सुरक्षा का संगम

गुवाहाटी स्थित नीलाचल पर्वत पर तैयारियां पूरी

  • देश भर के हजारों साधु आते हैं यहां

  • देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक

  • किसान भी कृषि कार्य नहीं करते

भूपेन गोस्वामी

गुवाहाटीः यहां के नीलाचल पर्वत पर विश्व प्रसिद्ध कामाख्या धाम में अंबुबाची महायोग-2025 की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। यह उत्सव देवी कामाख्या के वार्षिक मासिक धर्म चक्र का प्रतीक है और तंत्र साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस बार भी लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है, जिनमें देशभर से हजारों नागा साधु, तांत्रिक साधक और संन्यासी शामिल हैं।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, भक्तों के लिए कपाट 22 जून को दोपहर 2:56 बजे 27 सेकंड से बंद हो जाएंगे। तीन दिनों के बाद, यानी 26 जून की सुबह देवी स्नान और दैनिक अनुष्ठानों के बाद मंदिर के द्वार तीर्थयात्रियों के लिए फिर से खोल दिए जाएंगे। इस दौरान, विशेष रूप से 26 और 27 जून को जब मंदिर आम दर्शन के लिए खुलेगा, वीआईपी और वीवीआईपी पास उपलब्ध नहीं होंगे। नियमित दैनिक दर्शन 28 जून से फिर से शुरू होंगे। नीलाचल पहाड़ी पर श्रद्धालुओं के लिए आवास या भोजन वितरण की कोई व्यवस्था नहीं होगी ताकि स्वच्छ वातावरण बना रहे और भीड़ को नियंत्रित किया जा सके।

यह चार दिवसीय उत्सव स्त्री की सृजनात्मक शक्ति, स्त्रीत्व और उर्वरता की पवित्रता का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं और उनकी प्रतिमा के पास बिछाया गया सफेद कपड़ा उनके रज से लाल हो जाता है। इस कपड़े को भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है, जिसे अंबुवासी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह वस्त्र धारण करने वाले भक्तों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। तंत्र साधना की पूर्णाहुति अंबुबाची योग के दौरान ही होती है, इसलिए नीलांचल पहाड़ी की कई गुफाओं में तंत्र साधक इस दौरान कठिन तपस्या करते हैं।

कामाख्या देवी शक्तिपीठ देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब सुदर्शन चक्र से कटकर देवी सती के अंग भूमि पर गिरे थे, तब उनका योनि भाग यहीं नीलाचल पर्वत पर गिरा था। यही कारण है कि इस स्थान को कामक्षेत्र या कामरूप भी कहा जाता है। इसे तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहाँ हर साल देश-विदेश से तंत्र-मंत्र साधक अंबुबाची मेले में आते हैं।

मां कामाख्या के कपाट बंद होने के साथ ही किसानी से संबंधित कई कार्य वर्जित हो जाते हैं। चार दिनों तक न तो हल चलाए जाते हैं और न ही खेत जोते जाते हैं। बगीचों से फल या सब्जियां नहीं तोड़ी जातीं। इस अवधि में घरों और मंदिरों में पूजा-पाठ या अन्य धार्मिक कार्य नहीं किए जाते, केवल तपस्या की जा सकती है।