Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
Jalandhar BSNL Fire News: जालंधर के नागरा रोड एक्सचेंज में आग से मचा हड़कंप, इंटरनेट-टेलीफोन सेवाएं ... Punjab Weather Update: पंजाब के 12 जिलों में बारिश और तूफान की चेतावनी, मौसम विभाग ने जारी किया अलर्... गौवंश हत्या से दहला इलाका! गौ रक्षकों और ग्रामीणों का उग्र प्रदर्शन; '2 दिन में गिरफ्तारी वरना चक्का... Haryana Primary Education Reform: प्राथमिक स्कूलों में लागू हुआ 'हॉलिस्टिक प्रोग्रेस कार्ड', पास-फेल... Rohtak House Collapse: मकान की छत गिरने से दो महिलाएं मलबे में दबी, गर्भवती की हालत नाजुक; अस्पताल म... Real Hero of Kurukshetra: नहर में डूबते 3 लोगों का 'देवदूत' बना अंकित, जनसेवा दल ने वीरता के लिए किय... Yoga Teacher Blackmailing Case: योग गुरु और पत्नी गिरफ्तार, महिलाओं के निजी वीडियो से करते थे उगाही;... Road Accident News: भीषण सड़क हादसे में दो सगे भाइयों की मौत, तेज रफ्तार ट्रक ने बाइक को कुचला; पुलि... Pathways School Bomb Threat: पाथवेज स्कूल को मिली 'साफ और गंभीर चेतावनी', बम की खबर से दहशत; पूरे स्... Petrol Pump Theft Busted: पेट्रोल पंप पर लाखों की चोरी, CCTV फुटेज से हुआ खुलासा; पहचान छिपाने के लि...

ईरान-इजरायल तनाव और इराक युद्ध की पुनरावृत्ति का डर

वर्तमान में, मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, और ईरान तथा इजरायल के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक समुदाय के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर परमाणु हथियार विकसित करने का आरोप लगा रहे हैं, जिससे स्थिति और भी विस्फोटक हो गई है।

हाल ही में, उन्होंने तेहरान से लोगों को हटने का आग्रह किया है, क्योंकि इजरायल और ईरान के बीच युद्ध की तीव्रता काफी बढ़ गई है। यह स्थिति कई पर्यवेक्षकों को 2003 के इराक युद्ध की याद दिला रही है, जब अमेरिका ने समान आधार पर हस्तक्षेप किया था। ईरान इस समय एक कठिन राजनयिक स्थिति का सामना कर रहा है।

पाकिस्तान, जिसने पहले इजरायली हमले की स्थिति में ईरान का समर्थन करने का वादा किया था, अब पीछे हट गया है, जिससे ईरान अलग-थलग पड़ गया है। ईरान द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति से युद्ध रोकने की पहल का अनुरोध भी अनुत्तरित रहा है, जो तेहरान की निराशा को और बढ़ा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में, इराक पर अमेरिकी हमले के ऐतिहासिक संदर्भ को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। 2003 में, अमेरिका के नेतृत्व में इराक पर हमला मुख्य रूप से बुश प्रशासन के इस दावे पर आधारित था कि इराक के पास सामूहिक विनाश के हथियार थे और वह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहा था।

यह तर्क युद्ध के लिए प्राथमिक औचित्य था, लेकिन बाद में इस दावे की सत्यता पर गंभीर सवाल उठे। अमेरिका ने दृढ़ता से दावा किया कि इराक के पास रासायनिक, जैविक और संभवतः परमाणु हथियार थे, और सद्दाम हुसैन सक्रिय रूप से उन्हें विकसित कर रहे थे। तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने खुफिया जानकारी का हवाला देते हुए दुनिया को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि इराक एक तत्काल और गंभीर खतरा है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1441 के तहत सामूहिक विनाश के हथियारों के निरीक्षण का अधिकार दिया गया था, और अमेरिका ने तर्क दिया कि इराक इन प्रस्तावों का पालन नहीं कर रहा था। हालांकि, आक्रमण के बाद बड़े पैमाने पर खोज के बावजूद, इराक में कोई ऐसे हथियार नहीं मिले, जिससे अमेरिकी दावों की विश्वसनीयता पर भारी प्रश्नचिह्न लग गया।

इस विफलता ने युद्ध के औचित्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना और संदेह पैदा किया। तब अमेरिका ने यह भी आरोप लगाया कि इराक के अल-कायदा सहित आतंकवादी समूहों से संबंध थे, और सद्दाम हुसैन आतंकवाद का समर्थन कर रहे थे।

11 सितंबर, 2001 के हमलों के बाद, अमेरिका में आतंकवाद के खिलाफ एक तीव्र भावना थी, और बुश प्रशासन ने इस भय का उपयोग इराक पर सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के लिए किया।

उन्होंने सद्दाम हुसैन के शासन को वैश्विक आतंकवाद के नेटवर्क के हिस्से के रूप में चित्रित किया।हालांकि, जबकि इराकी अधिकारियों और अल-कायदा के बीच कुछ संभावित संपर्कों का सुझाव देने वाले सबूत सामने आए, आतंकवादी हमलों से सीधे संबंध कभी भी निर्णायक रूप से साबित नहीं हुए।

कई विश्लेषकों का मानना था कि इन संबंधों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था ताकि युद्ध के लिए जनता का समर्थन जुटाया जा सके। बुश प्रशासन ने यह भी तर्क दिया कि सद्दाम हुसैन का शासन क्षेत्रीय स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा था। उनका मानना था कि सद्दाम की आक्रामक नीतियां और हथियारों का कथित विकास पड़ोसी देशों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए खतरा पैदा कर रहा था।

इसलिए, उन्हें सत्ता से हटाना क्षेत्र को सुरक्षित करने और लोकतंत्र को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक था। शासन परिवर्तन युद्ध का एक अंतर्निहित लक्ष्य था, जिसमें यह उम्मीद की जा रही थी कि सद्दाम के हटने के बाद इराक में एक स्थिर, लोकतांत्रिक सरकार स्थापित होगी जो मध्य पूर्व में स्थिरता लाएगी।

हालांकि, इसके बजाय इराक में अस्थिरता, सांप्रदायिक हिंसा और एक दीर्घकालिक विद्रोह देखा गया, जिसके परिणाम आज भी महसूस किए जा रहे हैं। 11 सितंबर के हमलों ने अमेरिका में भेद्यता की एक गहरी भावना पैदा कर दी थी। इस भयावह घटना ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को ‘पहले हमला करने’ की रणनीति अपनाने पर विचार करने के लिए प्रेरित किया, खासकर उन देशों के खिलाफ जिन्हें वे आतंकवादी या सामूहिक विनाश के हथियारों का खतरा मानते थे।

बुश प्रशासन ने इराक को इस व्यापक ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया, यह तर्क देते हुए कि सद्दाम हुसैन का शासन अमेरिकी सुरक्षा के लिए एक अपरिहार्य खतरा था जिसे तुरंत बेअसर किया जाना चाहिए।

इसलिए अभी ईरान पर जो भी आरोप लग रहे हैं, वे कितने सच है, इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है। लेकिन हमारे पास यह इतिहास मौजूद है कि सिर्फ अमेरिकी सरकार के खिलाफ सर उठाकर खड़े होने की वजह से सद्दाम हुसैन को मौत के घाट उतार दिया गया। उसके बाद से इराक का क्या हाल है, यह भी हमारी नजरों के सामने है।