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भाजपा को वादा दिलाने का वक्त है यह

 

9 जून को नरेंद्र मोदी और उनके मंत्रिपरिषद के शपथ ग्रहण के ठीक एक साल पूरे हो गए हैं। चुनावों से पहले, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 69 पन्नों का घोषणापत्र प्रकाशित किया था। यहाँ भाजपा घोषणापत्र 2024 से 15 वादे दिए गए हैं। 2025 में वास्तविकता क्या है, इसकी परख तो पूर्व की घोषणाओं और उनके पूरा होने से की जा सकती है। भाजपा का एक वादा

गरीबों की थाली की सुरक्षा के लिए हमारे प्रयासों का विस्तार करना था। विश्व बैंक के अनुसार, 7.5 करोड़ भारतीय प्रतिदिन 225 रुपये से कम कमाते हैं। सबसे गरीब 5 फीसद लोग प्रतिदिन 68 रुपये खर्च करते हैं। एक शाकाहारी थाली की कीमत 77 रुपये है। दूसरा वादा नव-मध्यम वर्ग को सशक्त बनाना था।

वास्तविकता: 2014 और 2024 के बीच, घरेलू देनदारियाँ दोगुनी हो गई हैं, जबकि शुद्ध वित्तीय बचत पिछले 50 वर्षों में अपने सबसे निचले स्तर पर आ गई है। तीसरा वादा उच्च मूल्य वाली नौकरियाँ बनाना था। 2021 से, अधिक से अधिक लोगों को कृषि की ओर धकेला गया है। वर्तमान में 46 फीसद कार्यबल कृषि में लगा हुआ है। पाँच में से लगभग तीन लोग स्वरोजगार कर रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ रोज़गार का सबसे अच्छा तरीका नहीं कहते हैं।

चौथा वादा कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी थी पर 2018-23 के बीच, रोज़गार से जुड़ी गतिविधियों में लगी महिलाओं का अनुपात सिर्फ़ 2.3 प्रतिशत अंक बढ़ा है। पाँच वर्षों में रोज़गार से जुड़ी गतिविधियों पर बिताया गया समय सिर्फ़ 10 मिनट बढ़ा है। महिलाओं के लिए श्रम बल भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में आधी बनी हुई है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक) को लागू करना था।

लोकसभा में भाजपा की 13 प्रतिशत महिला सांसद हैं। विधेयक 2023 में पारित किया गया था। हालांकि, इसे जनगणना से जोड़ा गया था, जो 2027 में आयोजित की जानी है। जनगणना के बाद, परिसीमन अभ्यास आयोजित किया जाएगा। इन दोनों के बाद ही, विधेयक वास्तव में लागू हो सकता है। कब? कोई भी अनुमान लगा सकता है। प्रधानमंत्री ने

किसानों को मजबूत करने का वादा किया था। आज हालत यह है कि हर दिन 30 किसान आत्महत्या करते हैं। 2018-23 के बीच, ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी में सालाना 0.4 फीसद की गिरावट आई, जबकि कृषि मजदूरी में सालाना सिर्फ 0.2 फीसद की वृद्धि देखी गई।

पीएम किसान के तहत निधि को बढ़ाकर 12,000 रुपये करने के संसदीय समिति द्वारा दिए गए सुझाव को नजरअंदाज कर दिया गया है।

मेक इन इंडिया के तहत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने का वादा था। विनिर्माण क्षेत्र द्वारा जोड़ा गया मूल्य 2023 में सकल घरेलू उत्पाद के 12.3 फीसद से घटकर 2024 में 4.5 फीसद हो गया, जो 2014 के स्तर से नीचे है। कवच ट्रेन सुरक्षा प्रणाली का विस्तार की वास्तविकता है कि चार वर्षों में, कवच को केवल 2 फीसद मार्गों और 1 फीसद से भी कम इंजनों में स्थापित किया गया है।

बुलेट ट्रेनों का विस्तार में सरकार ने 60,000 करोड़ रुपये के अनुमानित व्यय के साथ 2014 के रेल बजट में बुलेट ट्रेन परियोजना की घोषणा की। 11 साल बाद, 71,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करने के बाद, परियोजना का आधा से भी कम हिस्सा पूरा हो पाया है। एक्सप्रेसवे और रिंग रोड का विस्तार में 2017 में सरकार ने भारतमाला परियोजना के तहत 34,800 किलोमीटर की मंजूरी दी थी।

हालांकि, इसमें से लगभग आधा ही पूरा हो पाया है। परियोजना का लगभग 25 फीसद हिस्सा अभी तक आवंटित भी नहीं हुआ है। निर्बाध कनेक्टिविटी के लिए हवाई अड्डों का विकास  में तीन साल पूरे होने से पहले ही 114 रूट बंद कर दिए गए हैं। 619 रूट चालू किए गए, जिनमें से आधे वर्तमान में उड़ान के तहत चालू हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के वादे में पिछले एक दशक में ईडी द्वारा सांसदों, विधायकों और राजनीतिक नेताओं के खिलाफ 193 मामलों में से केवल दो में ही दोषसिद्धि हुई है। पिछले 11 वर्षों में ईडी द्वारा कुल 5297 मामले दर्ज किए गए। केवल 47 मामलों में ही सुनवाई के लिए अदालत में ले जाया गया। दर्ज किए गए प्रत्येक 1000 मामलों में से केवल सात मामलों में ही आरोपी दोषी पाए गए। इसके अलावा चिकित्सा, कौशल विकास, पूर्वोत्तर में शांति का भी वादा था। पर हकीकत है कि मणिपुर में हिंसा शुरू हुए दो साल से ज़्यादा हो गए हैं। प्रधानमंत्री ने एक बार भी मणिपुर का दौरा नहीं किया है।

लिहाजा यह माना जा सकता है कि वादों को करने और निभाने के बीच सोच और विचार का अंतर है। नतीजा है कि भाजपा की केंद्र सरकार को बार बार खुद के बचाव के लिए गोल पोस्ट को एक जगह से दूसरे जगह ले जाना पड़ रहा है। इसके बाद भी उसके पुराने वादों को अब जनता याद दिलाने लगी है। बेचारे टीवी चैनल भी उनकी मदद नहीं कर पा रहे हैं।