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झारखंड के अगले डीजीपी पर जोड़ घटाव का खेल जारी

गृह विभाग के फरमान नहीं मानी तो 31 मई के बाद क्या होगा

  • वरीयता क्रम में अनिल पाल्टा सबसे ऊपर

  • यूपी के डीजीपी से भी जुड़ा हुआ है यह मामला

  • दिल्ली दरबार की भी नजर लगी है यहां पर

राष्ट्रीय खबर

रांचीः केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहले ही वर्तमान प्रभारी डीजीपी के बारे में झारखंड सरकार को कोई पत्र भेजा था। यह पत्र भी अज्ञात माध्यमों से लीक हो गया और यह बताया गया कि इसमें अनुराग गुप्ता को हटाने की बात कही गयी है। दूसरी तरफ जानकारों का मानना है कि राज्य के डीजीपी के पद पर फैसला लेने का अधिकार सिर्फ राज्य सरकार के पास होता है।

नये संशोधन के तहत प्रोन्नति अथवा पदस्थापन से पहले राज्य सरकार को यूपीएससी को एक वरीयता क्रम की सूची भेजना होता है, जिस पर स्वीकृति केंद्रीय लोक सेवा आयोग ही देता है। पिछले डीजीपी अजय कुमार सिंह को भी इसी सूची के आधार पर डीजीपी बनाया गया था। उन्हें समय से पहले ही हटा दिया है जबकि सुप्रीम कोर्ट में झारखंड की प्रोन्नति से संबंधित मामला लंबित ही है। अब इसी क्रम में 31 मई की चर्चा जोर पकड़ रही है। दरअसल इस चर्चा का स्रोत भी उत्तरप्रदेश से जुड़ा हैं, जहां के डीजीपी भी इस दिन सेवानिवृत्त हो रहे है।

झारखंड के आईपीएस कैडर लिस्ट के मुताबिक वरीयताक्रम में सबसे ऊपर अनिल पाल्टा है। वर्तमान में वह झारखंड में रेल डीजी के पद पर कार्यरत हैं। दूसरे नंबर पर वर्तमान प्रभारी डीजीपी अनुराग गुप्ता है। तीसरे नंबर पर प्रशांत सिंह हैं जो वर्तमान में डीजी वायरलैस के पद पर है जबकि चौथे नंबर पर एमएस भाटिया हैं जो वर्तमान में होमगार्ड्स और फायर सर्विसेज के डीजी पद पर हैं।

इनमें से पहले दो नंबर के अधिकारी वरीयता क्रम में 16 वें स्तर पर हैं जबकि बाकी दो 15वें स्तर पर हैं। इसके बाद तदाशा मिश्रा का नाम आता है जो वर्तमान में रेलवे की एडीजी हैं और उनके बाद संपत मीणा का नाम है जो वर्तमान में सीबीआई में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। चर्चा थी कि पूर्वी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में अमित शाह के आने पर इस पर बात होगी पर अचानक से पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर की वजह से यह कार्यक्रम स्थगित हो गया।

राज्य सरकार के लिए नये डीजीपी पद का फैसला लेना कठिन होगा और गृह मंत्रालय के निर्देश का वह पालन करेगी, इस बारे में भी यकीनी तौर पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। इसकी खास वजह अनुराग गुप्ता के पास एक नहीं तीन महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी है। उन्हें हटाने पर दो अन्य प्रमुख विभाग यानी निगरानी तथा विशेष शाखा में किसी नये पदाधिकारी को लाना पड़ेगा। राजनीतिक कारणों से हेमंत सरकार फिलहाल आनन फानन में कोई ऐसा फैसला नहीं ले सकती, जो बाद में उसके गले की हड्डी बन जाए।

वैसे बता दें कि विनय चौबे की गिरफ्तारी की वजह से अफसरों की समीकरण भी अचानक से पूरी तरह बदल गया है और नये समीकरण बनाने और बिगाड़ने का खेल जारी है। ऐसे में सलाह मांगे जाने पर मुख्यमंत्री के करीबी अधिकारी भी अपने हित की सोच रखते हुए ही सुझाव देंगे। जो हेमंत सोरेन के लिए कितना फायदेमंद होगा, उसकी परख बाद में होगी।

अंदरखाने से जो संकेत मिल रहे हैं, उसके मुताबिक इन तमाम मुद्दों पर फैसला सिर्फ रांची से ही नहीं हो पा रहा हैं बल्कि दिल्ली दरबार तक पहुंच रखने वाले अधिकारी भी अपने अपने तरीके से गुपचुप काम कर रहे हैं। इस वजह से राजनीतिक संतुलन को कायम रखते हुए पुलिस के मुखिया पद के नाम का चयन मुख्यमंत्री के लिए भी कठिन चुनौती है।