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बाबूजी धीरे चलना प्यार में जरा.. .. .. ..

बाबूजी लोगों को ध्यान दिलाना जरूरी है क्योंकि दिल्ली में अब हर तरफ से मुफ्त की रेवड़ियों की बारिश हो रही है। बाद में क्या होगा, कोई नहीं जानता पर अब भाजपा और कांग्रेस वाले भी अच्छी तरह समझ गये हैं कि अरविंद केजरीवाल की सफलता का असली राज क्या है। जब आम आदमी पार्टी का गठन हो रहा था तो अरविंद केजरीवाल ने एक बात कही थी, जो अब पूरी तरह सच साबित हो रही।

केजरीवाल ने कहा था हमलोग राजनीति करने नहीं बल्कि राजनीति बदलने आये हैं। अब हम इन दलों को दिखा देंगे कि राजनीति कैसे की जाती है। तो भइया अब उनका यह कथन सही साबित हो रहा है। जब केजरीवाल ने मुफ्त पानी और बिजली देने का एलान किया तो भाजपा और कांग्रेस वालों ने इसका मजाक उड़ाया था। अब दस साल के शासन के बाद दोनों राष्ट्रीय दलों को यह बात समझ में आ गयी कि दरअसल जनता को अपने साथ जोड़ने की कला इस केजरीबाबू को अच्छी तरह आती है। लिहाजा दिल्ली के चुनाव में हर कोई अपनी तरफ से वादों की बौछार कर रहा है।

कंफ्यूजन इस बात को लेकर है कि आखिर इतना सब कुछ अभी क्यों हो रहा है और पहले क्यों नहीं हो पा रहा था। तो क्या अऱविंद केजरीवाल ने जो पहले बात कही थी वह सही था कि पैसा बहुत है सरकार के पास सिर्फ यह पैसा नेताओं की जेबों में चला जाता है। वइसे केजरीवाल जी भी बिजली वितरण कंपनियों के मामले में पूरी तरह चुप्पी साध गये जबकि असली लड़ाई तो बिजली के बिल से ही प्रारंभ हुई थी। अदालत का एक फैसला आया और हर कोई इस अतिरिक्त बिजली के दाम पर चुप चाप हो गया। आखिर माजरा क्या है भाई।

खैर आज नहीं तो कल असली सच तो सामने आ ही जाएगा। जइसे पहले टूजी और थ्री जी घोटाला का हल्ला हुआ। कोयला घोटाला पर कई नेता जेल तक की हवा खा आये। बाद में पता चला कि सीएजी साहब यानी विनोद राय जी तो असल में संघ के आदमी थे जो अब भी राज ही भोग रहे हैं। जिनलोगों पर यह सब आरोप लगा वे सारे लोग बेदाग छूट गये। इसलिए सरकार बदलेगी तो असली राज आज नहीं तो दस साल बाद खुल ही जाएगा कि सच क्या था और झूठ क्या था।

कौन कहां पर और किसको, किस तरीके से धोखा दे रहा है, यह बात तुरंत समझ में आने वाली नहीं है। इसी बात पर एक काफी पुरानी फिल्म आर पार का एक गीत याद आ रहा है। वर्ष 1954 में बनी इस फिल्म के इस गीत को लिखा था मजरूह सुलतानपुरी ने और संगीत में ढाला था ओ पी नय्यर ने। इसे गीता दत्त ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना

हाँ बड़े धोखे हैं, बड़े धोखे हैं इस राह में

क्यो हो खोये हुये, सर झूकाये

जैसे जाते हो सब कुछ लुटाये

ये तो बाबूजी पहला कदम है

नज़र आते हैं अपने पराये

ये मोहब्बत है ओ भोलेभाले

कर ना दिल को गमों के हवाले

काम उल्फ़त का नाज़ूक बहोत है

आ के होठों पे टूटेंगे प्याले

हो गयी है किसी से जो अनबन

थाम ले दूसरा कोई दामन

जिंदगानी की राहें अजब हैं

हो अकेला तो लाखों हैं दुश्मन

तो वोटर बाबूजी लोग संभलकर चलिए पर जो रेवड़ियां चुनाव के पहले बांटी जा रही है, उन्हें लेने से परहेज मत कीजिए। जो नेता जो कुछ भी बांट रहा है वह उसकी अपनी कमाई नहीं है, कहीं से चंदा आया है तो उसका छोटा सा हिस्सा जनता तक पहुंच रहा है। इसलिए जहां से जो मिल रहा है, समेटते चले जाइए।

एक बार चुनाव हो गया, उसके बाद अनेक नेता गधे के सर से सींग की तरह फिर से गायब हो जाएंगे। सो जो आ रहा है उसको आने दीजिए। आने वाले दिनों में पता नहीं कौन सा नेता कहां पर नजर आये। कहीं सस्ता सिलेंडर तो कहीं बेरोजगारी भत्ता तो कहीं बुजुर्गों को अधिक पेंशन। सारा दांव इलेक्शन के वक्त ही खेला जाता है।

बाकी के टैम में भाई लोग चुप्पी साधकर बैठे रहते हैं। अच्छी बात है कि चुनावी भागदौड़ ने देश के मैंगो मैन को भी काफी समझदार बना दिया है। जनता जनार्दन भी जानती है कि कौन सी पतंग कितनी ऊंचाई तक उड़ सकती है। इसलिए चुनाव में वजनदार समझे जाने वाले नेताओं को बार बार रूई की तरह उड़ा देना भी इसी पब्लिक के वोट का कमाल है। अब अगले माह दिल्ली में नई सरकार बनेगी तो पता चलेगा कि तेल की धार किस तरह से बह रही है। एक अकेला सब पर भारी तो शायद इस बार भी सही साबित होने वाला है।