Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
फतेहगढ़ साहिब में भीषण सड़क हादसा! ट्रक-स्कूटी की टक्कर के बाद लगी भयानक आग; 2 लोगों की जिंदा जलकर द... लुधियाना में पहली ही बारिश में डूबे बाजार! 3-4 फीट पानी भरने से व्यापारियों का भारी नुकसान, भड़के दु... नवांशहर में कनाडा स्पाउज वीजा के नाम पर 8.70 लाख की ठगी! फर्जी डिग्री देकर ठगा, ट्रैवल एजेंट पर FIR ... दस लाख साल पुरानी बर्फ से खुलेगा अतीत का राज, देखें वीडियो लुधियाना में सरकारी स्कूल की 15 वर्षीय छात्रा अमानत संदिग्ध परिस्थितियों में लापता! पुलिस खंगाल रही ... सांसद अमृतपाल सिंह और बंदी सिखों की रिहाई मार्च पर चंडीगढ़ पुलिस का बड़ा एक्शन! 15 नेताओं पर FIR दर्... फाजिल्का में खौफनाक वारदात! सुलह के नाम पर बुलाया, इंस्टाग्राम पर रील पोस्ट की और तलाकशुदा पत्नी की ... JPSC-JSSC विवाद पर पूरे झारखंड में रेड अलर्ट! 6 अगस्त को विधानसभा घेराव की चेतावनी; स्पेशल ब्रांच ने... गुमला में अंधविश्वास का खौफनाक अंत! डायन के शक में महिला की टांगी से काटकर हत्या, आरोपी का पुलिस स्ट... रांची में भड़का छात्रों का आक्रोश! JPSC परीक्षा में धांधली को लेकर लोकभवन मार्च; CBI जांच की उठी मां...

नागरिकता के पीछे असली मुद्दे गौण

पिछले महीने की 17 तारीख को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने असम की नागरिकता के सवाल पर दूरगामी फैसला सुनाया। पीठ ने 4-1 की राय पर भरोसा करते हुए अपने अंतिम आदेश में कहा कि असम में नागरिकता के लिए पात्रता की आधार तिथि 25 मार्च 1971 होगी, न कि 1951। गौरतलब है कि राज्य के कई असमिया राष्ट्रवादी संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि पूरे देश में नागरिकता निर्धारित करने के लिए 1971 नहीं बल्कि 1951 को आधार वर्ष माना जाता है, असम के मामले में ऐसा नहीं हो सकता है।

2009 से समय-समय पर दायर की गई कुल नौ रिट याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ द्वारा एक साथ विचार किया गया। गौरतलब है कि राज्य में एएसयू और गण संग्राम परिषद के छह साल के विदेशी निष्कासन आंदोलन का राजनीतिक समाधान असम समझौते में पाया गया था।

14 अगस्त 1985 की आधी रात को हस्ताक्षरित त्रिपक्षीय समझौते में असम के लिए नागरिकता की ‘कट-ऑफ तारीख’ के रूप में 25 मार्च 1971 तय की गई। बाद में, उसी वर्ष 7 दिसंबर को, संसद ने नागरिकता अधिनियम में आवश्यक संशोधन पारित किए और अनुच्छेद 6ए जोड़ा, जो असम में भारतीय नागरिकता निर्धारित करने और प्राप्त करने के लिए कानूनी ढांचा बन गया।

राजीव गांधी सरकार के इस कदम को उस समय असम के सभी राजनीतिक दलों ने एक परिपक्व व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया। क्योंकि असमान संधियों के ढांचे में कानूनी शुद्धता, संवैधानिक नैतिकता और मानवता का लोकतांत्रिक संतुलन देखा गया था। हालाँकि आंदोलनकारी संगठनों की माँगें शुरू से ही 1951 की थीं।

लेकिन उस समय असम के आंदोलनकारी दबाव बनाने की स्थिति नहीं थे। इसलिए 1971 उनके लिए युद्ध विजय का स्वाद लेकर आया। दूसरी ओर, यह समझौता राज्य के अप्रवासी बंगालियों के लिए भी काफी स्वीकार्य प्रतीत होता है। 1951 से 1971 – इन बीस वर्षों का लाभ उन्हें मिला।

लेकिन असमिया राष्ट्रवाद के मूल में असंतोष और असन्तोष ही रहता है। इन बीस वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी जो असम आए और उनके बच्चे, कलम के एक झटके से पूर्ण भारतीय नागरिक बन गए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए असम के सीएम ने कहा, यह फैसला उनके लिए एक कड़वी निराशा की तरह है।

उनके मुताबिक असमिया राष्ट्र 1951 से मांग कर रहा है। असमिया राजनीति में सभी राजनीतिक दलों ने हमेशा स्थानीय लोगों के गुस्से का इस्तेमाल पूर्वी बंगाल मूल के अपने साथी नागरिकों के खिलाफ किया है।

हालाँकि, 2016 में राज्य में पहली बार भाजपा के सत्ता में आने के बाद से असम की आंतरिक राजनीति में बड़े बदलाव आए हैं। असमिया राष्ट्रवाद और हिंदू धर्म के मिश्रण और अंतःक्रिया ने एक नए और नवीन राजनीतिक पुनर्गठन को जन्म दिया।

2021 में भाजपा के मुख्यमंत्री बदलने के बाद से यह सिलसिला तेज हो गया है। जय आई आसमां की आवाज बदलकर जय श्री राम हो गई है।

कुछ इसी तरह देश के अन्य भागों में भी वहां के मुद्दों को इस विदेशी घुसपैठ के बोझ तले दबाने की पुरजोर कोशिश जारी है। असम समझौते के अनुच्छेद 6 को लागू करने के लिए 15 जुलाई, 2019 को न्यायमूर्ति बिप्लब कुमार शर्मा समिति का गठन किया गया था। समिति का गठन केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा किया गया था। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि इसकी रिपोर्ट उस मंत्रालय को सौंपी जाएगी। वह दस्तूर है। लेकिन आज तक मंत्राके शर्मा कमेटी की कोई रिपोर्ट पेश नहीं की गई है।

सिलचर के वकील धर्मानंद दबे ने सूचना के अधिकार के तहत केंद्र से पूछा कि क्या बिप्लब शर्मा समिति की रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंपी गई है या नहीं। पिछले सोमवार को केंद्र के संबंधित अधिकारी ने आरटीआई के जवाब में कहा कि केंद्र को कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी गई है। लेकिन राज्य के पास यह है।

इस संबंध में असम कैबिनेट की मौजूदा बैठक में इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया कि 52 राज्य सरकारें अगले साल अप्रैल में बिप्लब कुमार शर्मा समिति की सिफारिशों को लागू करेंगी। कहने की जरूरत नहीं है कि गैर-असमिया (बंगाली) को राज्य में लगभग कोई अधिकार नहीं होगा।

असम के इन घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि रोजी रोटी के सवाल को उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर गुम करने की कोशिशें जारी है। बाजार में प्याज और सब्जियों के दाम बढ़ने का असर आम आदमी पर क्या पड़ रहा है, इस बारे में सरकारें सोचना तक नहीं चाहती क्योंकि इस पर विचार का अर्थ गैर उत्पाद सरकारी खर्च को कम करना है।

इसके लिए प्रशासनिक व्यवस्था के तहत खर्च के बोझ का लगातार बढ़ना जनता को कितना फायदा पहुंचा रहा है, इस सवाल पर बहस से भी सरकारें भाग रही हैं।