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सुदेश को उसकी जमीन पर घेरने की तैयारी

कोरोना काल के काम का फल मिल सकता है आजसू को

  • रघुवर दास से बिगड़ा था रिश्ता

  • संगठन में नये नये लोगों को जोड़ा

  • महतो वोट की ताकत को स्थापित किया

राष्ट्रीय खबर

 

रांचीः सबसे युवा संगठन के तौर पर ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन की अपनी अलग पहचान है। यह भी एक सच है कि जब कोरोना महामारी के दौरान अन्य राजनीतिक दलों की गतिविधियां लगभग शून्य थी, आजसू प्रमुख लगातार सक्रिय थे। इसी दौरान आजसू ने राज्य के विभिन्न इलाकों में अपने सदस्यों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी की।

अपनी चुनावी राजनीति को धार देने के लिए भाजपा के पन्ना प्रमुख की रणनीति के बदले आजसू ने चूल्हा प्रमुख का चयन किया और लगातार विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखा। अब इसका लाभ इस संगठन को चुनावी मैदान में मिल सकता है। पिछले चुनाव में सुदेश महतो को अपने ही गठबंधन में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास का परोक्ष विरोध सबसे अधिक झेलना पड़ा था।

इस बार वैसी स्थिति नहीं है। इसके बाद भी एनडीए में होने के बाद भी भाजपा यही चाहती है कि आजसू प्रमुख सिर्फ अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित होकर रह जाएं। वैसे सिल्ली विधानसभा के समीकरण अमित महतो के झारखंड मुक्ति मोर्चा में वापस लौटने की वजह से बदले हैं।

इसके अलावा महतो वोट के सुदेश महतो के एकाधिकार को दूसरे तरीके से चुनौती मिल रही है। आजसू की दूसरी मजबूत सीट पर फिर से कांग्रेस की ममता देवी की सक्रियता गौर करने लायक बात होगी। ममता देवी को झारखंड उच्च न्यायालय से हरी झंडी मिल चुकी है इसलिए चंद्रप्रकाश चौधरी से नाराज लोग निश्चित तौर पर ममता देवी के साथ एकजुट होंगे।

वैसे सीट समझौता के तहत चंदनकियारी की सीट भाजपा को मिलने के बाद सुदेश महतो के घनिष्ठ उमाकांत रजक का झामुमो में शामिल होना सिर्फ इत्तेफाक नहीं भी हो सकता है। हो सकता है कि अपने गुट की ताकत को मजबूत रखने के लिए सुदेश की सहमति उमाकांत रजक के खेमाबदल में रही हो।

लंबोदर महतो ने यूं तो अपने क्षेत्र में लगातार सक्रियता बनाये रखी है लेकिन मैदान में इस बार उनकी चुनौती पहले जैसी आसान नहीं होगी, यह भी स्थानीय लोग बता रहे हैं। वैसे इस बार की चुनावी राजनीति यहां साफ कर रही है कि महतो वोट की अहमियत को नये लोग भी समझ रहे हैं और शायद इसी वजह से महतो वोट की ताकत पर नये चेहरे भी धूमकेतु की तरह राजनीति के आसमान में नजर आये हैं।

इन सभी समीकरणों के बीच सुदेश महतो को बढ़त का एकमात्र कारण उनकी निरंतर सक्रियता है। कोरोना काल के दौरान जिन नये सदस्यों को जोड़ा गया था, उन्हें लगातार राजनीतिक तौर पर अधिक परिपक्व बनाकर सुदेश ने अपना काफी काम पहले ही हल्का कर लिया है। लिहाजा कम सीटों पर चुनाव लड़ने के बाद भी चुनाव परिणाम यह तय करेगा कि सुदेश महतो का राजनीतिक कद अब कितना ऊपर उठा है अथवा नीचे आया है।