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परीक्षा से आगे….

हिंदी दिवस के मौके पर अलग अलग किस्म के आयोजनों के बीच मुंशी प्रेमचंद को याद करना भी एक बड़ी बात है।

साहित्यकार और उपन्यासकार के तौर पर उन्होंने हिंदी

साहित्य को खास तौर पर आम जनों के बीच लोकप्रिय

बनाने की नींव रखी और इस भाषा को और विस्तार दिया।

श्रीमती राज लक्ष्मी सहाय उन्हीं की रचनाओं को क्रमवार तरीके से आगे बढ़ाने का एक साहसिक प्रयास कर रही हैं।

वर्तमान दौर में यह भी भाषा को समृद्ध करने के साथ साथ इसके ऐतिहासिक विरासत को याद करते हुए अगली पीढ़ी को मुंशी प्रेमचंद के बारे में अवगत कराना भी साहित्य सेवा है।

प्रस्तुत है इस कड़ी का अगला कड़ी की अगली रचना

 

राज लक्ष्मी सहाय

देवगढ़ रियासत के दीवान सुजान सिंह बूढ़े हो गए। उन्होने राजा के समक्ष स्वयं प्रस्ताव रखा कि उन्हे कार्य से मुक्त किया जाए।

वृद्ध अवस्था थी कहीं भूल चूक हो गई तो जीवन भर की नेकनामी मिट्टी में मिल जाएगी इतने योग्य दीवान को त्यागना न चाहते थे राजा।

मगर सुजान सिंह न माने। तब राजा साहब ने उन्हें ही नया दीवान नियुक्त करने की जिम्मेदारी सौंप दी। कार्य कठिन था। कैसे चुनाव नये दीवान का।

विज्ञापन निकाला गया। किसी डिग्री, जाति धर्म का बंधन न था। स्वस्थ होना अनिवार्य था आचार विचार की परीक्षा थी। परीक्षा की अवधि एक महीना रखी गई। बात उचित थी।

कुछ घंटो में या एक दो दिनों में किसी को कैसे आंका जा सकता था। देवगढ़ में रंग बिरंगे सजधज के साथ उम्मीदवारों की भीड़ लग गई। परीक्षार्थी स्वयं को जैसा दिखा रहे थे असलियत में वैसे न थे।

सारे के सारे बगुलों की भांती सफेद। मगर सुजान सिंह को उन बगुलों में से हंस की तलाश थी। हंस ही क्यों इसलिए कि हंस गहरे पानी में जाकर मोती ला सकता है। बगुला नदी के तट पर आखें मूंदकर एक टांग पर खड़ा रहता है।

मछली किनारे तक आए तो झपट्टा मारे। आखिर सुजान सिंह को हंस मिल ही गया। इसके लिए अदभुत परीक्षा ली थी सुजान सिंह ने। हॉकी के खेल का आयोजन किया गया। खेल समाप्त हुआ। खिलाड़ी वापस लौट रहे थे।

मार्ग में एक नाला पड़ता था। वहाँ एक बैलगाड़ी थी। पीछे का दोनों पहिया नाले में धसा था। अनाज की बोरियां थीं बैलगाड़ी में। गाड़ीवान वहीं खड़ा मदद की आशा में था वहीं से खिलाड़ी गुजर रहे थे।

उसे देखकर भी जैसा न देखा। सब के सब मद में चुर। सबसे पीछे एक खिलाड़ी लंगड़ाता चला आ रहा था। खेलने के दौरान पैर में चोट लग गई थी। गाड़ीवान को देख वह रूक गया पास गया। नाले में उतर गया। कीचड़ में घुटने तक धंसा था। हीम्मत न हारी कुछ प्रयासों में ही बैलगाड़ी का पहिया बाहर था।

सुजान को नया दीवान मिल चुका था। जो गरीब की मदद करे- जिसमें आत्मबल हो साहस हो और बिना मांगे किसी की मदद करें।

परीक्षा के परिणाम ने सबको चौंका दिया। दिखावे का नाटक जो एक महींने चला था -व्यर्थ गया। गाड़ीवान की सहायता करने वाले पंडित जानकीनाथ को नया दीवान नियुक्त किया गया। बुढा दीवान सुजानसिंह संतुष्ट। राजा साहब प्रसन्न – जनता खुश। सुजान सिंह धर्म र्तीथ की यात्रा पर चल पड़े

नया दीवान जानकीनाथ चकित था। उसने बैलगाड़ी का पहिया निकाला तो कहा था गाड़ीवान के वेश में सुजानसिंह ने –

“ गहरे पानी में बैठने से ही मोती मिलता है।“

और, सचमुच मोती ही मिला था जानकीनाथ को। दीवान का प्रतिष्ठित पद। अपने इस अनुभव को जानकीनाथ अपने बेटे को सुनाता।

बेटा जयंत कहता –“ आपकी परीक्षा तो बड़ी अनूठी परीक्षा थी पिताजी।“

“हाँ इसके लिए परीक्षक भी तो अनोखा होना चाहिए। सुजानसिंह की तरह । अन्यथा उम्मीदवारों में कोई किसी से कम दिखाई न देता था। मगर वह हृदय की परीक्षा थी हृदय दिखाई नहीं देता। बड़ी पैनी नजर और विवेक चाहिए हृदय का स्वरुप पहचानने के लिए। “

जानकीनाथ का बेटा जयंत समझ न पाता कि हृदय का स्वरूप कैसे पहचाना जाता है। वह हाई स्कूल का विद्यार्थी था। उसके लिए परीक्षा एक हौवा थी। परीक्षक यमराज से कम नहीं स्मरण मात्र से पसीना आ जाए।

अभी तक जेहन में परीक्षा के अनेक दृष्टांत थे। उसने पिता से सुना था। एक परीक्षा ली थी विश्वामित्र नें हरिश्चंद्र की। सत्यव्रत की परीक्षा थी। परीक्षा क्या थी हृदय को कतर देने की प्रक्रिया थी । मगर हरिश्चंद्र तो हरिश्चंद्र ही थें –

चंद्र टरै सूरज टरै

तरै जगत संसार

पर राजा हरिश्चंद्र का

टरै न सत्य विचार

और, हरिश्चद्र परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। सत्य के पर्याय बन गए।

एक अनूठी परीक्षा ली थीन धौम्य ऋषि ने। शिष्य आरूणि को खेत की मेड़ बनाने भेजा था भीषण वर्षा में माटी का मेड़ बार-बार बनाता- बार बार बह बह जाती। आखिर अपनी देह को ही मेड़ बनाकर लेट गया।

जयंत ऐसे परीक्षक और ऐसे शिष्य की कल्पना भी न कर सकता था। और तो और एकलव्य ने तो अंगूठा ही काटकर गुरू को सौंप दिया।

ऐसे शिष्य क्या अलग माटी से गढ़ता है भगवान । जयंत को कर्ण की याद आ जाती। दानवीरता की परीक्षा ली गई। कवच कुंडल उतारकर दे दिया इंद्र को। भगवान राम जी को तो भूल ही नहीं सकता जयंत । पितृभक्ति में चौदह वर्ष का बनवास स्वीकार किया।

जयंत इस बात से आहलादित हो जाता था कि इन परीक्षाओं में शिष्य की जीत हुई। यह बात अलग थी कि ऐसे विजेता शिष्यों के गुरूओं की शिक्षा सार्थक हो गई। शिष्य विजयी हुआ तो गुरू भी कहाँ पराजीत हुआ। ?

जयंत को अपने पिता पर बड़ा गर्व था। जानकीनाथ की कार्यप्रणाली की प्रसिद्धि दूर दूर प्रदेंशों में फेलती गई।

अंग्रेजी राज जड़े जमा चुका था। अब परीक्षा लेनेवाले बदल गए। गोरे अफसर कर्मचारियों के मापदण्डं अलग थे। अब तो किसी भी परीक्षा में उतीर्ण वहीं होते थे जो भारतभूमी से गद्दारी और गोरी सरकार के हिमायती थे। एक ही परीक्षा में भारतीय उम्मीदवार अधिक योग्य होकर भी अनुतीर्ण हो जाता।

जयंत भी इसी रंगभेद की शिकार कई बार हुआ। कई परीक्षाएँ दी उसने। उतीर्ण होने की सबसे पहली शर्त होती थी कि उम्मीदवार अंग्रेज हो। बस सारी प्रतीभा धरी की धरी।

उसी काल खण्ड में एक और परीक्षा हो रही थी।भारत माता अपने पुत्रों की परीक्षा ले रही थी। देशभक्ति की परीक्षा । भगत राजगुरू लाला लाजपत सरीखे भारत संतान अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे। उनकी आहुतियों से अंग्रेजी हुकूमत की क्रोधिग्नि सौगुणी बढती जाती बलिदानों की देह में निर्मीक हो समाहित हो जाती थी।

बलिदानी क्रानितकारी शहीदों की परीक्षा का परीक्षाफल निकला -भारत की आजादी।

जयंत होनहार था। आखिर जानकीनाथ का बेटा था। एक दफ्फतर में अच्छे पद पर आसिन हुआ। कर्मचारियों की नियुक्ति करनी थी। अपने बूढ़े पिता से परामर्श लेने गया। उसके विचार से उसके पिता जैसा परीक्षक होना असंभव था। पिता जानकीनाथ बोले-हिदायत दे रहे थे –

“विवेक से चुनाव करना। जिसे तुम्हारी आत्मा स्वीकारे।“

“निष्पक्ष होकर परीक्षा लेना। यह पुण्य का कर्तव्य है।“

“असर पुरे समाज और देश पर पड़ेगा। समझ लेना भारत माता के अस्तित्व पर।“

उम्मीदवारों के नाम और योग्यता की फाइलें लेकर जयंत बड़े साहब के पास पहुंचा।

“क्या लेकर आए हो जयंत ? बड़े साहब का प्रश्न था।

“उम्मीदवारों की अर्जी है साहब।“

साहब पान खा रहे थे। पीकदान में पान थुकते बोले।

“अरे अर्जी वर्जी क्या देखना। किसको लेना है वह तो पहले से ही तय है।

जयंत की आंखे खुलकर बड़ी सी हो गईं।

“क्या कह रहे है साहब।“

“अपनी मंत्री जी का दामाद है न। बस उन्हें ही रख लेना है।“

जयंत खामोश था। बड़े साहब ने मंत्री के दामाद का नाम और अर्जी का नम्बर एक पुर्जा में लिखा। जयंत की ओर ब़ढ़ाया। कहा –

“ कमीज की जेब में रख लो। तीन दिन के बाद मंत्रीजी को खबर भेज देंगे। दामाद जी का चयन हो गया।

घंटी बजाकर साहब ने चपरासी को बुलाया।

“जयंत बाबू को चाय पिलाओ। हमें अपनी श्रीमती जी की सेवा में निकलना है। “

साहब निकल गए।

घर आया जयंत। सीधे पिता के पास पहुँचा।पूछा पिता ने-

“हो गई नियुक्ति ?

“हो गई“

“किसको नियुक्त किया

“मैंने नहीं चुना। पहले से तय था।

“ ऐसा क्यों ?

“बड़े साहब का आदेश था

“ योग्यता ?

“ मंत्रीजी का दामाद होने की योग्यता

पंडित जानकीनाथ इस बात मे अनभिज्ञ नहीं थे कि मुल्क में कैसी हवा चल रही। आजादी को मनमानी मान लिया गया। स्वंतत्रता को उच्छृखलता। स्वहित, स्वार्थ पद का लोभ भ्रष्टाचार की फसल तैयार की जा रही है।परीक्षाओं का दौर चलता गया- चल रहा प्रक्रिया नयी – परीक्षार्थी का रूप नया परीक्षक का स्वरूप अलग।

दो वर्ष-चार वर्षो की पढ़ाई का मुल्यांकन दो घंटे या तीन घंटे कमरे में बैठकर। सुजानसिंह को दीवान के चुनाव में एक महीने का समय लगा था। यहाँ प्रश्न के बगल में गलत या सही का निशान लगा दो निर्णय हो गया। पात्रता की परीक्षा उटपटांग। पद और योग्यता में कोई सामंजस्य नहीं।

विदेशी कंपनियां भी आने लगीं थीं भारत में। आजादी से पहले आर्थिक शोषण किया था। अब मेधा लूटने का षडयंत्र रचा गया। पश्चिमी रंगीन सुविधा और पैसे की खनक के पीछे युवा अंधे होने लगे। उम्र की परिपक्वता के साथ और अचंमा बढ़ता गया। सफलता की शर्ते बदलती गईं।

यथा-

कौन अधिक से अधिक जायज नाजायज तरीके से अपने मालिक के लिए वसूली कर सकता है।

भ्रष्टाचार के उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है।

झूठ फरेब दिखावा का पोषक है।

आत्मसम्मान को संदूक में बंद कर उचित अनुचित कर्म कर सकता है।

रंगा सियार बन छदम छल का धर्म निर्वाह कर सकता है।

सफलता के इन मापदण्डों को तोड़कर चकनाचूर करना चाहता था जयंत। मगर इन शर्तों की जड़ें जमती ही जाती थी। जैसे कोई जादुई खाद की खुराक खिलाता हो अपमूल्यों को। जानकीनाथ वृद्ध हो चले । आंखे धुंधली हो गई थी। मगर मनुष्यों के बूढ़े जौहरी तो थे ही।

जयंत की आवाज – पदध्वनि पदचाप सांसों की गति से समझ लेते थे बेटे के मानसिक उद्वेग को। दफतर से आया था जयंत। संध्या समय।

“ कैसा चल रहा काम ?कैसा चल रहा अपना देश ?

“ काम हो रहा पिताजी। और काम बिगड़ रहा। “

“ सो कैसे ?

“धड़ल्ले से सड़के बनाई जा रहीं, -मगर कुछ ही महीनें में गढ़ढ़े में तब्दील हो रही। ठेकेदारों की अट्टालिका बन रहीं। मजदूर आजीवन मजदूर आजीवन मजदूर रहने को बाध्य हैं। फासला बढ़ रहा अमीरी गरीबी का । “

“ सुन रहे आप न ? “ आखें बंद किए जानकीनाथ से जयंत न पूछा।

“ हाँ हाँ बोलो“

“ पुल के खम्मे दूर से चमकते हैं थोड़े दिनों में भहराकर गायब यहं परीक्षा में उतीर्ण इंजीनियरों की करामात है पिताजी “

“ कैसी व्यवस्था बनाई है परीक्षा की।

कैसे परीक्षक- कैसे परीक्षार्थी- कैसे विषय- कैसे परिणाम “

जानकीनाथ के समझ भारतीय समाज की विकृत तस्वीर बनती नजर आई। तस्वीर पूरी बनी तो कोई तस्वीर न थी। केवल काला रंग पुता नजर आ रहा था। उन्होंने कहा जयंत से –

“ समाज काले कालिख भरे कागज में परिणत हो गया। हे सके तो सफेद खल्ली लेकर आओ और कुछ नये अक्षर लिखो जयंत। मैंने कभी जिन अक्षरों को गढ़ा था – क्या कुछ स्मरण है। ? जयंत अनजाने में ही माथा खुजा रहा था। थोड़ी देर में कहा-

खल्ली ढ़ूढ कर लाऊँ पिताजी ? कहा से लाऊँ कहाँ लिखूँ ?

ऐसा क्यों ?

“ सबके हाथ में एक उपकरण है। अक्षर लिखे नहीं जाते। उसपर ऊंगली दबाई जाती है। खुद अंकित हो जाता है। मशीन की मर्जी है। आदमी की मर्जी नहीं चलती। ऊंगलियाँ खल्ली पेंसिल कलम पकड़ना भूल रही है। इस उपकरण ने आदमी को अंगूठाछाप बना दिया है। इसका नाम है मोबाइल। मोबाइल तीव्र कदमों से चल रहा मानव जड़ बन रहा। “

पंडित जानकीनाथ माता सरस्वती की प्रतिमा का स्मरण करते हुए धीरे धीरे आखें बंद कर रहे थे……..